रविवार, २० एप्रिल, २०२५

नीति (आचार) - राष्ट्रपिता जोतीराव फुले

आज के इस धार्मिक द्वेष फैलाने वाले माहौल में, राष्ट्रपिता जोतीबा फुले के मुसलमान और इस्लाम के बारे में विचार जानना बहुत जरूरी है इसलिए उनके किताब से इसे लिख कर निकाला है।

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..... अब यदि कहो कि यह सारा अनर्थ क्यों और कैसे, तो थोड़ा सूक्ष्मा विचार करने से सहज ध्यान में आ जाएगा कि सारा अनर्थ भागवत और रामायण के कारण ही हुआ है!

प्रश्न: तो कुल सारे संसार में नीति (आचार) का आचरण करने वाले कोई नहीं है क्या?

उत्तर: ऐसा क्यों कहता है? मोहम्मद के धर्म में नीति अनुसार आचरण करके अपने सिरजमहार को संतुष्ट करने वाले बहुतेरे लोग हैं!

प्रश्न: किंतु मुसलमान लोगों ने तो कितने हैं मूर्तिपूजकों की बलात सुन्नत की और उनका धर्म बिगाड़ा है, इसलिए तो धूर्त आर्य ब्राह्मणों ने के द्वेष भरे ग्रंथों में लिखा मिलता है "न नीचो यवनात्पर:"। मुसलमान लोगों के कुरान को कोई न पढ़े, ना समझे इस हेतु से उन्होंने शास्त्रों में एक नियम ही बना डाला वह इस प्रकार से है " न वदेद्यावनी भाषां कण्ठे प्राणगते अपि।"

उत्तर: जो भी अज्ञानी मूर्तिपूजक पाखंडी आर्य भूदेव नटों के स्वार्थ भरे कृत्रिम धर्म के पाश में अटके हुए हैं, उनका उद्धार हो, इसलिए कई सारे धार्मिक जवांमर्द मुसलमान हथेली पर सिर रखते, तलवार की बल पर उन मूर्तिपूजको की अपनी तरह ही सुन्नत करते हैं -उन्हें "बिस्मिल्ला हिर रहिमान निर्रहीम" महापवित्र कलमा पढ़वाते हैं और उन्हें अपने सबके साथ धर्ममार्ग पर ले जाते हैं। क्योंकि मुहम्मदी लोगों के पवित्र ग्रंथ कुरान में बताया गया है कि सारे प्राणियों का निर्माणकर्ता खुद विशेष वह एक ही है और इसलिए वे उसे खुदा कहते हैं और उसे खुदा के बनाए हुए सभी इंसानों को आपस में भाई - भाई मानते हैं। इसी तरह कुल सारे मानवों को उनका पवित्र कुरान पढ़ने, देखने की तथा उसके अनुसार आचरण करने की छूट है। इसी तरह से सबको अपनी बराबरी का हक और उनके साथ रोटी - बेटी व्यवहार करने की अनुमति देते हैं। और अंतिम बात यह कि सब को पैदा करने वाले उस खुदा का आभार मानने के लिए उन्हें मस्जिद में अपने साथ लेकर बैठतें हैं। 

प्रश्न: यदि उनके पवित्र कुरान में ऐसा लिखा है कि कुल सारे मानव परस्पर एक दूसरे के भाई- बंधु माने और उसी प्रकार एक दूसरे से बरतें, तो फिर आर्यो के अथर्ववेद में भी इसी तरह का एक श्लोक है। वह इस प्रकार है:-

श्लोक
सहृदयं सांमनस्यम अविद्वेषं कृणोमि वः। 
अन्योन्य अभिहर्यत वत्संजातं इवाघ्न्या।
अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः। 
जाया पत्ये मधुवर्तीं वाचं वदतु शांतिवाम्।
मा भ्राता भ्रातारं द्विषद मा स्वसारं उत स्वसा।
सम्यंचः सव्रत: भूत्वा वाचं वदत भद्रया।

अर्थ:- तुम एकमत होकर एक ह्णदय रहो। कोई किसी से द्वेष ना करें । नवजात वत्स को देखकर जैसे गौ आनंदित होती है, तुम सब उसी भांति एक दूसरे से प्रेम करो। पुत्र पिता की आज्ञा का पालन करें, माता से एकमत होकर आचरण करें। पत्नी पति से एकता रखें और उससे सदा मधुर भाषण करें । भाई - बहनों में किसी प्रकार का द्वेषभाव न हो । इस प्रकार मीठी बोली बोल कर सब परस्पर एकता बनाए रखें।

प्रश्न: उन आर्यों के ग्रंथ में यदि ऐसा श्लोक था, और वे आज इस काल जो यह इस प्रकार का श्लोक अथर्ववेद में से निकाल दिखाते हैं, तो फिर निर्दयी आर्यों के शासन काल में वह जो शूद्रादि अतिशूद्रो को, म्लेंच्छ आदि लोगों को भिन्न- भिन्न जाति का मान कर उनको तुच्छ शुद्र माना जाता था और उन्हें अनेक प्रकार से सताया जाता था, वह सारी रीत क्या कहीं से अपने आप आ गई थी?

उत्तर: पहले काल से लेकर आज तक धूर्त आर्य ब्राह्मणों ने अपने अपवित्र रेशमी वस्त्र में वेदों को छुपा कर रखा था ना, इसी कारण ऐसा अनर्थ हो गया।

उत्तर: धूर्त आर्य ब्राह्मनों ने अपने पुराने काल में जिन शूद्रदि अतिशुद्रो को दास अनुदास बनाया था, उन्हें वे अपने वेदों का एक शब्द भी सुनने नहीं देते थे और आज अंग्रेज बहादुर के पक्षपातरहित राज्य में यह धूर्त आर्य अपने वेदों के वाक्यों को तुच्छ माने गए शुद्रादि अतिशुद्रो के पैरों में फेंक लुढ़का रहे हैं, जैसे कोई बेचारा लोटन कबूतर हो। किंतु अब उनका वह वेदरूपी काला चिथडा हम शुद्रादि अतिशुद्रो  के बीच नहीं चाहिए। दूर ही रखो उसे।

प्रश्न: अच्छा, वह कुछ भी क्यों ना हो, परंतु यह कहिए कि धर्मशील जवांमर्द मुसलमानों ने शुद्रादि अतिशुद्रो को धूर्त आर्य ब्राह्मनों की ढोंगी दासता से मुक्त क्यों नहीं कराया?

उत्तर: धूर्त आर्य ब्राह्मणों ने अपने रेशमी पवित्र वस्त्र में लपेटकर जिन वेदों को छिपाकर रखा था, मुसलमानों ने उन वेदों को खोज निकाला नहीं और उसमे जो जो झूठ कपट भरा था, खोज करके उन शुद्रादि अतिशुद्रो को मुसलमान नहीं बनाया, उन सब को अपने समान ही पवित्र मानवीय अधिकारों का उपभोग करने का अवसर नहीं दिया, यह उन सारे जोशीले मुसलमानों की भूल है। मैं स्वीकार करता हूं, यह उनसे भूल हुई है। इसी कारण तो यह सारा अनर्थ हुआ है।

प्रश्न: लगता है - उन मुट्ठी भर आर्य ब्राह्मणों के वेदों की जांच पड़ताल करने में आपके वे जवाँमर्द मुसलमान लोग आर्य धर्म के उन अति कोपी ऋषिगणों के शाप से डर गए होंगे।

उत्तर: मुसलमान लोग यदि उनके धूर्त आर्य ऋषियों के शाप से डरने वाले होते, तो वे आर्यों के सोरठी सोमनाथ की मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े ना कर पाते। परंतु हुआ यह कि मुसलमान लोग ऐश्वर्य के गर्व में कुछ मग्न हो गए और उधर अति कुशल मुकुंदराज, ज्ञानोबा, रामदास आदि ब्रह्मवृन्द के महाधूर्त साधुओंने यह किया कि उस कल्पित भागवत पुराण के कपटी चतुर्मुखी चतुराई वाले काले कृष्ण की कुतर्कभरी गीता में पार्थ अर्जुन को जो उपदेश दिया गया है, उसे आधार बनाया और प्राकृत देसी भाषा में विवेकसिंधु, ज्ञानेश्वरी, दासबोध आदि अनेक प्रकार से पाखंड भरे ग्रंथ रच डाले। इन सारी पाखंडी पोथीयों के कपट जाल में शिवाजी जैसे महावीर किंतु निरक्षर व्यक्ति को फसा दिया और उसे मुसलमानों से भिड़ने में और उनका पीछा करने में उलझा दिया। इसीलिए मुसलमान लोगों को कुल सारे महाधूर्त आर्यों का भंडाफोड़ करने की फुर्सत ही नहीं मिल पाई। यदि कहा जाए कि यह कहना गलत है, तो फिर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि जिस समय मुसलमान लोग इस देश में आए, ठीक उसी समय धुर्त आर्य मुकुंदराज के मन में शुद्रादि अतिशुद्रो के प्रति इतनी दया क्यों कर उमड़ पड़ी कि उसने देशी भाषा में विवेकसिंधु ग्रंथ की रचना क्यों की? इसके पीछे धूर्तता यह छिपी है कि कहीं अज्ञानी शुद्रादि अतिशुद्रो मुसलमान होकर धूर्त आर्य ब्राह्मणों के स्वार्थी धर्म की थूक्का फजीहत ना कर दे । सारांश यह - मुसलमान लोगों को इन महा धूर्त आर्य ब्राह्मणों का सारा रहस्य बाहर निकालने की फुर्सत मिल पाती, तो जैसे धुनिया धुन धुन कर कपास की धज्जियां उड़ा देता है, यों उन्होंने वेदों के साथ साथ आर्यों की कुल सारी पुस्तकों की धज्जियां उड़ा कर मटियामेट कर डाला होता।

प्रश्न: धूर्त आर्य ब्राह्मण मुसलमानों को या अन्यो को भी अपने पवित्र वेद बाहर निकाल कर दिखाते क्यों नहीं है? उन्हें पढ़ने से मनाई क्यों करते हैं? इसके पीछे रहस्य क्या है, यह यदि आप हमें बताएं तो उचित होगा।

उत्तर: धूर्त आर्य पंडितो ने हमें बड़ी कपट नीति चलाकर आज तक भी अपने खुंसत पुराने वेदों को बाहर नहीं निकाला है, इस कारण वे शुद्रादि अतिशुद्रो के साथ बड़े घमंड से अकड़ दिखा पाते हैं । यदि कहीं धूर्त आर्यों ने वेदों का अनुवाद अनुवाद करके सब लोगों के लिए प्रसिद्ध किया होता, तो अवश्य ही कुल सारे  शुद्रादि अतिशुद्रोने, म्लेच्छ आदि लोगों ने भी धूर्त पंडितों की बड़ी छिछलेदार की होती। उनसे बड़े चाव से मांग महार जाति वाले काम कराए होते। क्योंकि धूर्त आर्य ब्राह्मणों ने इस बलीस्थान में जब जब आक्रमण किए, हर बार उन्होंने यहां के मूल निवासियों क्षत्रियों को पाताल में गाड़ कर उन्हें किस किस तरह से सताया था । इस विषय का वेदों में कहीं उल्लेख मिलता है, सब कुल सारे  शुद्रादि अतिशुद्रो को जैसे ही आर्यों की चालबाजी समझ आयीं होती तो वह उनसे चोरी छुपे भी रोटी व्यवहार नहीं करेंगे। यही नहीं, मैं निश्चय से भविष्य कहता हूं, कि वह लोग आर्यों की छाया भी अपने शरीर पर पड़ने नहीं देंगे । वेदरूपी भैंस पानी में है, फिर यह धूर्त आर्य ब्राह्मण उसका मोल कैसे लगाते हैं ? कौन से गांव की रीत है यह है?

प्रश्न: तो फिर आप के मत से नीति किसे कहा जाए ?

उत्तर: हम सबके उत्पत्तिकर्ता को संतोष देने के लिए जो कोई भी सर्वजनहितकारी सत्य का भय मन में रखकर अन्य मानव बंधुओं के साथ वैसा ही आचरण करता हो, उसे ही नीति (आचार) कहना चाहिए, फिर ऐसा आचरण करने वाला चाहे ईसाई हो या मुसलमान हो, चाहे सत्यशोधक समाजी हो, अथवा गांव का कोई अनपढ़ गवार हो वह नीतिमान है।
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संदर्भ- नीति (आचार) के संदर्भ में यशवंत और जोतीराव फूले इनका संवाद

महात्मा जोतीराव फुले समस्त साहित्य 2 
"सार्वजनिक सत्य धर्म पुस्तक" 
हिंदी अनुवाद प्रा. वेदकुमार वेदालंकार 
महात्मा फुले चरित्र साधने प्रकाशन समिति

आस्तिक

आम्ही सगळेच भुकेनं व्याकुळ
जेवणाचं ताट समोर आलं
पोट भरलं 
अन 
त्यांनी समाधान व्यक्त करत देवांचे आभार मानले
उन्हातान्हात राबणाऱ्या शेतकऱ्यांना मी कृतज्ञता व्यक्त केली....
माझ्याकडे बघत ते सगळे एका सुरात बोलले
तुझ्यासारख्या लोकांमुळे देशात अनर्थ होतोय, नरकात जाशील...
???
निःशब्द