रविवार, २० एप्रिल, २०२५

नीति (आचार) - राष्ट्रपिता जोतीराव फुले

आज के इस धार्मिक द्वेष फैलाने वाले माहौल में, राष्ट्रपिता जोतीबा फुले के मुसलमान और इस्लाम के बारे में विचार जानना बहुत जरूरी है इसलिए उनके किताब से इसे लिख कर निकाला है।

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..... अब यदि कहो कि यह सारा अनर्थ क्यों और कैसे, तो थोड़ा सूक्ष्मा विचार करने से सहज ध्यान में आ जाएगा कि सारा अनर्थ भागवत और रामायण के कारण ही हुआ है!

प्रश्न: तो कुल सारे संसार में नीति (आचार) का आचरण करने वाले कोई नहीं है क्या?

उत्तर: ऐसा क्यों कहता है? मोहम्मद के धर्म में नीति अनुसार आचरण करके अपने सिरजमहार को संतुष्ट करने वाले बहुतेरे लोग हैं!

प्रश्न: किंतु मुसलमान लोगों ने तो कितने हैं मूर्तिपूजकों की बलात सुन्नत की और उनका धर्म बिगाड़ा है, इसलिए तो धूर्त आर्य ब्राह्मणों ने के द्वेष भरे ग्रंथों में लिखा मिलता है "न नीचो यवनात्पर:"। मुसलमान लोगों के कुरान को कोई न पढ़े, ना समझे इस हेतु से उन्होंने शास्त्रों में एक नियम ही बना डाला वह इस प्रकार से है " न वदेद्यावनी भाषां कण्ठे प्राणगते अपि।"

उत्तर: जो भी अज्ञानी मूर्तिपूजक पाखंडी आर्य भूदेव नटों के स्वार्थ भरे कृत्रिम धर्म के पाश में अटके हुए हैं, उनका उद्धार हो, इसलिए कई सारे धार्मिक जवांमर्द मुसलमान हथेली पर सिर रखते, तलवार की बल पर उन मूर्तिपूजको की अपनी तरह ही सुन्नत करते हैं -उन्हें "बिस्मिल्ला हिर रहिमान निर्रहीम" महापवित्र कलमा पढ़वाते हैं और उन्हें अपने सबके साथ धर्ममार्ग पर ले जाते हैं। क्योंकि मुहम्मदी लोगों के पवित्र ग्रंथ कुरान में बताया गया है कि सारे प्राणियों का निर्माणकर्ता खुद विशेष वह एक ही है और इसलिए वे उसे खुदा कहते हैं और उसे खुदा के बनाए हुए सभी इंसानों को आपस में भाई - भाई मानते हैं। इसी तरह कुल सारे मानवों को उनका पवित्र कुरान पढ़ने, देखने की तथा उसके अनुसार आचरण करने की छूट है। इसी तरह से सबको अपनी बराबरी का हक और उनके साथ रोटी - बेटी व्यवहार करने की अनुमति देते हैं। और अंतिम बात यह कि सब को पैदा करने वाले उस खुदा का आभार मानने के लिए उन्हें मस्जिद में अपने साथ लेकर बैठतें हैं। 

प्रश्न: यदि उनके पवित्र कुरान में ऐसा लिखा है कि कुल सारे मानव परस्पर एक दूसरे के भाई- बंधु माने और उसी प्रकार एक दूसरे से बरतें, तो फिर आर्यो के अथर्ववेद में भी इसी तरह का एक श्लोक है। वह इस प्रकार है:-

श्लोक
सहृदयं सांमनस्यम अविद्वेषं कृणोमि वः। 
अन्योन्य अभिहर्यत वत्संजातं इवाघ्न्या।
अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः। 
जाया पत्ये मधुवर्तीं वाचं वदतु शांतिवाम्।
मा भ्राता भ्रातारं द्विषद मा स्वसारं उत स्वसा।
सम्यंचः सव्रत: भूत्वा वाचं वदत भद्रया।

अर्थ:- तुम एकमत होकर एक ह्णदय रहो। कोई किसी से द्वेष ना करें । नवजात वत्स को देखकर जैसे गौ आनंदित होती है, तुम सब उसी भांति एक दूसरे से प्रेम करो। पुत्र पिता की आज्ञा का पालन करें, माता से एकमत होकर आचरण करें। पत्नी पति से एकता रखें और उससे सदा मधुर भाषण करें । भाई - बहनों में किसी प्रकार का द्वेषभाव न हो । इस प्रकार मीठी बोली बोल कर सब परस्पर एकता बनाए रखें।

प्रश्न: उन आर्यों के ग्रंथ में यदि ऐसा श्लोक था, और वे आज इस काल जो यह इस प्रकार का श्लोक अथर्ववेद में से निकाल दिखाते हैं, तो फिर निर्दयी आर्यों के शासन काल में वह जो शूद्रादि अतिशूद्रो को, म्लेंच्छ आदि लोगों को भिन्न- भिन्न जाति का मान कर उनको तुच्छ शुद्र माना जाता था और उन्हें अनेक प्रकार से सताया जाता था, वह सारी रीत क्या कहीं से अपने आप आ गई थी?

उत्तर: पहले काल से लेकर आज तक धूर्त आर्य ब्राह्मणों ने अपने अपवित्र रेशमी वस्त्र में वेदों को छुपा कर रखा था ना, इसी कारण ऐसा अनर्थ हो गया।

उत्तर: धूर्त आर्य ब्राह्मनों ने अपने पुराने काल में जिन शूद्रदि अतिशुद्रो को दास अनुदास बनाया था, उन्हें वे अपने वेदों का एक शब्द भी सुनने नहीं देते थे और आज अंग्रेज बहादुर के पक्षपातरहित राज्य में यह धूर्त आर्य अपने वेदों के वाक्यों को तुच्छ माने गए शुद्रादि अतिशुद्रो के पैरों में फेंक लुढ़का रहे हैं, जैसे कोई बेचारा लोटन कबूतर हो। किंतु अब उनका वह वेदरूपी काला चिथडा हम शुद्रादि अतिशुद्रो  के बीच नहीं चाहिए। दूर ही रखो उसे।

प्रश्न: अच्छा, वह कुछ भी क्यों ना हो, परंतु यह कहिए कि धर्मशील जवांमर्द मुसलमानों ने शुद्रादि अतिशुद्रो को धूर्त आर्य ब्राह्मनों की ढोंगी दासता से मुक्त क्यों नहीं कराया?

उत्तर: धूर्त आर्य ब्राह्मणों ने अपने रेशमी पवित्र वस्त्र में लपेटकर जिन वेदों को छिपाकर रखा था, मुसलमानों ने उन वेदों को खोज निकाला नहीं और उसमे जो जो झूठ कपट भरा था, खोज करके उन शुद्रादि अतिशुद्रो को मुसलमान नहीं बनाया, उन सब को अपने समान ही पवित्र मानवीय अधिकारों का उपभोग करने का अवसर नहीं दिया, यह उन सारे जोशीले मुसलमानों की भूल है। मैं स्वीकार करता हूं, यह उनसे भूल हुई है। इसी कारण तो यह सारा अनर्थ हुआ है।

प्रश्न: लगता है - उन मुट्ठी भर आर्य ब्राह्मणों के वेदों की जांच पड़ताल करने में आपके वे जवाँमर्द मुसलमान लोग आर्य धर्म के उन अति कोपी ऋषिगणों के शाप से डर गए होंगे।

उत्तर: मुसलमान लोग यदि उनके धूर्त आर्य ऋषियों के शाप से डरने वाले होते, तो वे आर्यों के सोरठी सोमनाथ की मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े ना कर पाते। परंतु हुआ यह कि मुसलमान लोग ऐश्वर्य के गर्व में कुछ मग्न हो गए और उधर अति कुशल मुकुंदराज, ज्ञानोबा, रामदास आदि ब्रह्मवृन्द के महाधूर्त साधुओंने यह किया कि उस कल्पित भागवत पुराण के कपटी चतुर्मुखी चतुराई वाले काले कृष्ण की कुतर्कभरी गीता में पार्थ अर्जुन को जो उपदेश दिया गया है, उसे आधार बनाया और प्राकृत देसी भाषा में विवेकसिंधु, ज्ञानेश्वरी, दासबोध आदि अनेक प्रकार से पाखंड भरे ग्रंथ रच डाले। इन सारी पाखंडी पोथीयों के कपट जाल में शिवाजी जैसे महावीर किंतु निरक्षर व्यक्ति को फसा दिया और उसे मुसलमानों से भिड़ने में और उनका पीछा करने में उलझा दिया। इसीलिए मुसलमान लोगों को कुल सारे महाधूर्त आर्यों का भंडाफोड़ करने की फुर्सत ही नहीं मिल पाई। यदि कहा जाए कि यह कहना गलत है, तो फिर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि जिस समय मुसलमान लोग इस देश में आए, ठीक उसी समय धुर्त आर्य मुकुंदराज के मन में शुद्रादि अतिशुद्रो के प्रति इतनी दया क्यों कर उमड़ पड़ी कि उसने देशी भाषा में विवेकसिंधु ग्रंथ की रचना क्यों की? इसके पीछे धूर्तता यह छिपी है कि कहीं अज्ञानी शुद्रादि अतिशुद्रो मुसलमान होकर धूर्त आर्य ब्राह्मणों के स्वार्थी धर्म की थूक्का फजीहत ना कर दे । सारांश यह - मुसलमान लोगों को इन महा धूर्त आर्य ब्राह्मणों का सारा रहस्य बाहर निकालने की फुर्सत मिल पाती, तो जैसे धुनिया धुन धुन कर कपास की धज्जियां उड़ा देता है, यों उन्होंने वेदों के साथ साथ आर्यों की कुल सारी पुस्तकों की धज्जियां उड़ा कर मटियामेट कर डाला होता।

प्रश्न: धूर्त आर्य ब्राह्मण मुसलमानों को या अन्यो को भी अपने पवित्र वेद बाहर निकाल कर दिखाते क्यों नहीं है? उन्हें पढ़ने से मनाई क्यों करते हैं? इसके पीछे रहस्य क्या है, यह यदि आप हमें बताएं तो उचित होगा।

उत्तर: धूर्त आर्य पंडितो ने हमें बड़ी कपट नीति चलाकर आज तक भी अपने खुंसत पुराने वेदों को बाहर नहीं निकाला है, इस कारण वे शुद्रादि अतिशुद्रो के साथ बड़े घमंड से अकड़ दिखा पाते हैं । यदि कहीं धूर्त आर्यों ने वेदों का अनुवाद अनुवाद करके सब लोगों के लिए प्रसिद्ध किया होता, तो अवश्य ही कुल सारे  शुद्रादि अतिशुद्रोने, म्लेच्छ आदि लोगों ने भी धूर्त पंडितों की बड़ी छिछलेदार की होती। उनसे बड़े चाव से मांग महार जाति वाले काम कराए होते। क्योंकि धूर्त आर्य ब्राह्मणों ने इस बलीस्थान में जब जब आक्रमण किए, हर बार उन्होंने यहां के मूल निवासियों क्षत्रियों को पाताल में गाड़ कर उन्हें किस किस तरह से सताया था । इस विषय का वेदों में कहीं उल्लेख मिलता है, सब कुल सारे  शुद्रादि अतिशुद्रो को जैसे ही आर्यों की चालबाजी समझ आयीं होती तो वह उनसे चोरी छुपे भी रोटी व्यवहार नहीं करेंगे। यही नहीं, मैं निश्चय से भविष्य कहता हूं, कि वह लोग आर्यों की छाया भी अपने शरीर पर पड़ने नहीं देंगे । वेदरूपी भैंस पानी में है, फिर यह धूर्त आर्य ब्राह्मण उसका मोल कैसे लगाते हैं ? कौन से गांव की रीत है यह है?

प्रश्न: तो फिर आप के मत से नीति किसे कहा जाए ?

उत्तर: हम सबके उत्पत्तिकर्ता को संतोष देने के लिए जो कोई भी सर्वजनहितकारी सत्य का भय मन में रखकर अन्य मानव बंधुओं के साथ वैसा ही आचरण करता हो, उसे ही नीति (आचार) कहना चाहिए, फिर ऐसा आचरण करने वाला चाहे ईसाई हो या मुसलमान हो, चाहे सत्यशोधक समाजी हो, अथवा गांव का कोई अनपढ़ गवार हो वह नीतिमान है।
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संदर्भ- नीति (आचार) के संदर्भ में यशवंत और जोतीराव फूले इनका संवाद

महात्मा जोतीराव फुले समस्त साहित्य 2 
"सार्वजनिक सत्य धर्म पुस्तक" 
हिंदी अनुवाद प्रा. वेदकुमार वेदालंकार 
महात्मा फुले चरित्र साधने प्रकाशन समिति

आस्तिक

आम्ही सगळेच भुकेनं व्याकुळ
जेवणाचं ताट समोर आलं
पोट भरलं 
अन 
त्यांनी समाधान व्यक्त करत देवांचे आभार मानले
उन्हातान्हात राबणाऱ्या शेतकऱ्यांना मी कृतज्ञता व्यक्त केली....
माझ्याकडे बघत ते सगळे एका सुरात बोलले
तुझ्यासारख्या लोकांमुळे देशात अनर्थ होतोय, नरकात जाशील...
???
निःशब्द

गुरुवार, ९ जानेवारी, २०२५

बालपण आणि शिक्षण

'मम्मा, तुला माहित आहे का सैटर्न (आपला शनी😀) इतका हलका आहे की तो पाण्यावर सहज तरंगु शकतो'. ऑ, खरच.. अस म्हणत मी फक्त आश्चर्यकारक चेहरा करायचा. नेहमीप्रमाणे तीचे बोलणे ऐकत होती. ती पुढे बोलू लागली, 'त्याला रिंग असल्याने तो आपल्या सगळ्या प्लेनेटमध्ये सुंदर दिसतो. तसे सगळेच प्लेनेट सुंदरच आहेत, जसे सगळे रंग असतात...' आपले बोलून ती परत नव्या खेळात गुंतली अन मी माझ्या बालपणात रमली. 

मला शनिची ओळख कशी झाली असेल? कदाचित शनिवारी नख, केस कापू नये अशी? की अमक्या तमक्याला शनी लागलाय अशी ? शनी शांत करण्यासाठी शनिवारी उपवास करावा लागतोय, त्याला तेल द्यावे लागते अश्या माहितीने? आठवतं का काही, स्वतालाच विचारु लागली. 

जाऊ देत, गाथाला माहित झालेला शनी खुप वेगळा आहे. कदाचित सगळ्यानाच असे आपले ग्रहतारे कळले असते तर... मात्र आपल्याला ओळख होते ते आपल्या कुंडलिच्या ग्रहांची अन खेळ सुरु होतो राशी अन कोणत्या राशीला कोणता ग्रह भारी याच्या भीतीचा.. 
मात्र जरी असे झालं तरी की सौर मन्डळ आधी शिकलो तर खरंच भय राहिलं नसतं? 

मग येवढे साइंस, विज्ञान का सौर मंडळचा अभ्यास करणारे यांना भिती दिसते ती कश्यामूळे? मंगळावर वा चंद्रावर माणुस पोहोचला, येवढे शोध लावलेत पण काय यापैकी कुणीच इतकं 'पुन्यवान' नसावं की स्वर्गांत जावून सगळं सगळं शोधून, फोटो काढुन खाली पाठवतील? 

माझ्यासारखीच अनेकाना नव्हे तर किंबहुना सर्वानाच मृत्यूची ओळख झाली ती माणुस मेल्यावर एक तर भूत बनतो नाहीतर पुण्यवान असेल तर स्वर्गात जातात. माझ्या लेकीने मानवी हाडाचा सापळा पाहिला तो म्यूजियममध्ये. कोणत्यातरी हेलोवीनच्या वीडियो मध्ये, तेही केवळ त्या सणाला पोशाख म्हणुन फनी makeup असतो, हेच तीला माहिती. 

मागील महिन्यात तीचे आजोबा गेले आणि नंतर ती एक दिवस सांगत होती की, कुणी मेले की खुप खुप दिवसानी त्याचे स्केलेटन/ सापळा बनतो. कधी कधी तिला आजोबा आठवले तर ती नाराज होतेच पण त्यांच वय झाले होते, ते आजारी होते म्हणून त्यांची एनर्जी संपली हे तिला माहीत आहे. एक दिवस सगळ्यांची एनर्जी पुर्ण नष्ट होते, हे निसर्गचक्र आहे म्हणे...  ती बोलते अन मी नुसत्या कल्पनेने शांत होते.

मला लहानपणी काय माहीत होतं? सकाळी आकाशात सूर्य असतो अन रात्रि चंद्र तारे हेच अनेक वर्षे असलेले ज्ञान. खुप उशिरा समजले की दिवसा पण चंद्र तारे असतात पण सूर्याच्या प्रखर प्रकाशामूळे आपल्याला दिसत नाही. आम्ही मात्र शिकलो, देवान लहानपनीच सूर्य गिळायला झेप घेतली... आता मोठी माणसं सांगतात तर खरच असेल हा विश्वास.

असो, माणुस अन सगळे जीवच नाहीतर कदाचित आपली पृथ्वी जो एकमेव ग्रह आहे की ज्यावर माणुस अन अन्य जिवंत राहू शकतात, ते सुद्धा नष्ट होईल? 800 मिलियन  वर्षापूर्वी आपल्या मदर अर्थ वर सुद्धा कोणता जीव नव्हताच, ते सगळ हळुहळु विकसित झाले.... गाथा पुरानानुसार 😊😊 जे जे निर्माण होते ते नष्ट होणारच

अजून तरी तिला भूताची भिती नाही कारण ते फक्त कार्टून किन्वा इमैजिनेशन म्हणजे कल्पना आहे यावर ती ठाम आहे. तिला भूत नाही तर मेल्यावर हाडाचा सापळाच होतो जो काहिच करु शकत नाही हे माहीत आहे. मला मात्र लहानपणी बाहेर अंधारात भूत आहेच, स्मशानाच्या रस्त्याने भूत असते हे इतकं बिंबवले आहे की, आजही भूताचे सिनेमे पाहणार नाही 😀😀. भूत नसते हे मान्य पण मनाला कोण सांगेल. 

असो, मातृभाषेत शिकले पाहिजे असं मलाही वाटतं पण भाषा कोणती यापेक्षा वैज्ञानिक दृष्टिकोन आणि शिकण्यात आवड, इंटरेस्ट ज्यात निर्माण होतो ते शिक्षण, ती भाषा, ते माध्यम महत्वाचं.

बुधवार, ६ एप्रिल, २०२२

मानसिकता जवळपास सारखीच...

काही दिवसांपूर्वी आमच्या बिल्डिंगच्या गेटजवळ एक चारचाकी थांबली. 7/8 वर्षांच्या मुलासोबत त्याचे आईवडील आणि आजी गाडीतून उतरले. गेटमधून आत आले आणि तो छोटा मुलगा परत मागे वळला. गेटच्या बाहेर जाऊन आवाराच्या भिंतीकडे तोंड करून त्याने लघवी केली. तोपर्यंत त्याचे आईवडील घरात पोहचले होते. पहिल्या मजल्यावर असलेल्या कुटुंबाकडे ते पाहुणे म्हणून आले होते. खर तर, पहिल्याच मजल्यावर जायचं होतं, गेटबाहेर करण्यापेक्षा तो मुलगा धावत पळत वर जाऊन बाथरूममध्ये पण जाऊ शकत होता. त्याच्या मामाचं घर आहे, नेहमी येत असतो तो इकडे पण... सामाजीकरण / Socialisation सुरवातीला घरातून होते, असे म्हणतात मग या गोष्टींचा समावेश बहुतेक घरात होत नसावा. बागेत सुद्धा आया आपल्या मुलांना सहज बोलतात जा तिकडे कर, जेव्हा की व्यवस्थित सोय केलेली असते. आणि मग पुरुष जेव्हा असे कुठेही भिंतीकडे तोंड करून उभे दिसले की म्हणायचं की पुरुषांना लाज वाटत नाही... असल्या कृतीचं समर्थन मुळीच नाही पण ज्या समाजीकरणाच्या प्रक्रियेत मुली/ महिला घडविल्या जातात, अगदी तसेच मुलं/ पुरुष पण घडविले जातात. फक्त मुलींना बंधन शिकविली जातात तर मुलांना निर्लज्ज वागणं? 

घटना एक

काल परवाचीच घटना, आम्ही दोघी मायलेकी आमच्या ओळखीच्या घरी गेलो होतो. माझ्या लेकीपेक्षा एक वर्षे मोठा असलेला मुलगा, आई गृहिणी पण इंजिनिअरची डिग्री असलेली तर वडील कॉलेजमध्ये शिकवणारे. आमच्या गप्पा सुरु असतांना ही दोन्ही मुले आम्ही बसलो त्याच हॉलमध्ये आमच्या समोर खेळत होती. पाच वाजत आले आणि ऊन जरा कमी झाले म्हणून समोरचे दार उघडलं आणि ही दोन्ही पोरं अंगणात खेळू लागली. फक्त गेटच्या आत खेळा असे सांगून आम्ही हॉलमध्येच बसलो होतो. काही वेळाने माझी लेक आत येऊन मला म्हणाली, त्याला असं काय आहे? त्याने पकडून कुंडीतील झाडावर सु सु केली.. पहिल्यांदाच पाहिलं म्हणून तिला प्रश्न पडणे साहजिकच होतं. तिला तर सांगितले पण त्या मुलाच्या आईला सांगितलं की मुलांना याच वयात अश्या गोष्टींचं योग्य वळण लावलं पाहिजे. तर लगेच त्या मुलाची आजी ( तिची आई )भडकली, आम्ही काय त्याला बाहेर मुतायला शिकवतो काय? आता बाहेर एवढे लोकं करतात तर आम्ही घरात येतो. मोठा झाला की कळेल त्याला... सगळ्यात महत्त्वाचं म्हणजे ती म्हणाली की आमच्या पोराला सांगण्यापेक्षा तुझ्या पोरीला सांग ना की कोणी अस मुतत असेल तर तिकडे पाहू नको... अर्धी दुनिया असे करते, कोणाकोणाला सांगशील... खरं तर मी त्यांच्या घरी पाहुणी तरी ती बाई येवढं बोलली, समजा दुसरं कोणी असते तर? यात एक गोष्ट म्हणजे हे सर्व बोलणं होत असताना त्या मुलाची आई मात्र शांत होती.

घटना दोन

एका एनजीओमध्ये बेघर मुलांसोबत काम करणारी बारावीपर्यंत शिकलेली धार्मिक घरातील मैत्रीण. अश्या धार्मिक लोकांकडे असते तसे तिच्या घरी सुद्धा एका बापूचे पूजन व्हायचं. त्याच्या सत्संगाला जाणारी ही मंडळी. त्यांच्या घरी त्याच्या फोटोचं रोज पूजन व्हायचं, आणि त्या स्वयंघोषित संतावर स्त्रियांच्या शोषणाचे आरोप झाले. त्याला पोलीस कस्टडी आणि नंतर कारागृहात रवानगी झाली. त्यानंतर तिच्या घरी तो फोटो अन पूजन दिसलं, तिला विचारले असता ती म्हणाली, तो पुरुष आहे, तो नालायक आहे पण या स्त्रिया का जवळ जातात? कुणी स्वताहून तर असं काही करणार नाही, बायांना समजत नाही का या माणसाची नियत खराब आहे? सस्तंग ऐकावं, प्रसाद घ्यावा, गर्दी असेल तेव्हाच रहावं तिथे मग कुणाची हिम्मत होईल. बाया लगट करतात मग त्याला संधी भेटल्यावर तो कश्याला सोडेल? बापू, संत महात्मा असला तरी, आहे तर पुरूष....

घटना तीन

पदव्युत्तर शिक्षण घेतलेली. चार पुस्तके वाचलेली आणि चार पुस्तके लिहिलेली लेखिका. समाजमाध्यमातून संपर्कात आलेली. खूप हुशार, समजदार, अनेक कलागुणांना अंगी बाळगून असलेली मैत्रीण. मताधिकार वापरू शकतो म्हणजे तरुण असलेल्या एका मुलाची आई. नवऱ्याच्या जाचाला कंटाळून पाच सहा वर्षांपासून कायदेशीर वेगळी झालेली. चारेक वर्षांपूर्वी शांत जीवनाच्या शोधात एका महिन्यासाठी तीने (भिक्खू) श्रामणेरी दीक्षा घेतली होती. त्याच दरम्यान तिच्यापेक्षा 6/7 वर्षे वयाने लहान, अविवाहित उच्च शिक्षित तरुण श्रामणेर तिच्या संपर्कात आला. विश्वास, प्रेम आणि नंतरच्या काळात त्यांनी लग्न केले. ती सर्वसामान्य जीवन जगत आहे तर तो अजूनही चिवर धारण करून आहे. जेव्हा त्याला तिला भेटायला यायचं असते तेव्हा तो सर्वसामान्य कपडे घालून येतो. मला कायम वाटतं की तो ज्या बुद्ध धम्म परंपरेला मानतो म्हणजे चिवर धारण केले आहे आणि त्या पवित्र वस्त्राचा अपमान करतो याचा अर्थ तो तिलाही धोका देत असावा. पण एक दिवस चर्चा सुरू असताना ती म्हणाली की, बाया काही कमी नसतात, त्यांनी चिवर घातले पण देखणे तरुण आहेत म्हणून काही बाया स्वताहून त्यांना व्हिडिओवर आपले शरीर उघडे करून दाखवतात. मला वाटलं त्याने असेच सांगितले असेल तर ती म्हणाली की तिने स्वता त्याच्या मोबाईल मध्ये त्या बायांचे स्क्रीनशॉट बघितले. त्याने तिला दाखवण्यासाठी ठेवले होते म्हणे. तिच्या बोलण्याने मला वाईट नाही तर तिच्या विचाराची कीव आली. एवढी शिकलेली, लेखिका कवयित्री आणि ती म्हणते, ' चिवर जरी अंगावर असलं तरी आहे तर तो पुरुष, शारीरिक गरज,  लैंगिक भावना आहेत त्याला...
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तुम्हालाही असे अनुभव आणि त्यामुळे मनात निर्माण आहेतच..

शुक्रवार, १४ जानेवारी, २०२२

कोरोना महामारी, लॉक डाऊन, शाळाबाह्य मुलांचा प्रश्न

 कोरोना महामारी, लॉक डाऊन, शाळाबाह्य मुलांचा प्रश्न

कोरोना महामारी व लॉक डाऊन च्या या काळात अनेक प्रकारांनी आपण त्रासलोय. अनेकांचे भरुन न  येणारे नुकसान झाले आहे. तर काहींसाठी लॉकडाउन मौजमजा आहे. एकीकडे काहींसाठी वर्क फ्रॉम होम ची सुविधा आहे. तर दुसरीकडे बहुसंख्य जनतेचे मात्र केवळ हाल आहेत. पोटा-पाण्याचा प्रश्न आहे.

या काळात सर्वांनाच समस्यांना सामोरे जावे लागत आहे. काहींचे काम बंद झाले, काहींचे पगार झाले नाहीत. जे काही नुकसान झाले ते झेलण्याची तयारी पण झाली. पण सर्वात जास्त नुकसान शैक्षणिक क्षेत्रात झालेले दिसून येत आहे. ज्यांच्याकडे सोयीसुविधा आहे त्यानी आपल्या पाल्यांच्या ऑनलाइन क्लासेस च्या माध्यामातून शिक्षणाचा प्रश्न सोडावयाचा प्रयत्न केला. यातूनच इंटरनेट चा अति वापर आणि पुढे याचाच गैरवापर असे प्रश्न निर्माण झाले आहेत. ज्यांच्याकडे साधा फोन देखील नाही अशी मुले मात्र शाळा सुरु होण्याची वाट पहात आहेत.

अशी मुले शिक्षणापासून दुर होतील काय? ही भीती वाटत राहते. तसाही आपल्या देशात शाळाबाह्य मुलांचा मोठा प्रश्न आधीपासूनच आहे. दरवर्षी त्यात वाढ होते. यात आता लॉक डाऊन मुळे शाळा बंदी. सर्व मुलांबद्दल काळजी करावी अशी स्थिती आहे.

माहेरघर

मी म्हटलं, भावाच्या घरी आलेय. वर जाताजाता नेमकं तेच वहिनीला ऐकायला गेले... अरचू, भावाचे घर नाही, माहेरी आले म्हणा, शब्द महत्त्वाचे असतात... माहेरचा किस्सा मैत्रिणीला सांगत होती, ती म्हणाली, "कुछ भी बोल यार, भाई तो अच्छे हैं तेरे लेकिन दोनों भाभी भी अच्छी मिली.. तू बहुत लकी है ! बहुत नेक काम किए होंगे.....  मी जास्त काही बोलणार इतक्यात परत तीच म्हणाली, "तो हमने कौन से बुरे काम किए हैं..." अग, तुझे माहेर जवळ आहे एका गावात म्हणून असं म्हणत आम्ही विषय थांबविला. 

मी भाग्य वैगेरे मानत नाही. तिचा फोन ठेवल्यावर अनेक चेहरे आठवले, खूप चांगली माणसं तरीही कठीण प्रसंगी एकटीच असलेली. आपली मायेची माणसं असावी असे बहुतेक सर्वांना वाटत असेल, अगदी जवळ नसली तरी चालेल पण असावी. आटपाट नगराची गोष्ट आठवली? श्रीमंत भाऊ आणि गरीब बहिणीची. माझ्या बालपणी पुस्तके विकत घेण्याइतपत श्रीमंती नव्हती. आई वडिलांच्या कृपेने हुशारी जन्मजात मिळाली, मग काय? जे मास्तर शाळेत शिकवत ते सहज पाठ व्हायचं. बालवाडीत तर साऱ्या गावातील पोरं जमली तरी जो पर्यंत मी दिसत नव्हती बाईला शाळा भरल्यासारखे वाटत नव्हतं म्हणे. तेव्हापासून सवय, कोणीही म्हटलं ते गाणं / कविता म्हणून दाखव, आपलं सादरीकरण सुरू व्हायचं. आटपाट नगरच्या कथेने तर लय प्रसिद्ध केले होते. पैसे पण द्यायच्या आयाबाया. माझ्या आईसारखे अनेकांना ती आपलीच कथा वाटायची. त्यांच्या भावना कदाचित तेव्हा मला समजत नव्हत्या. माझ्यासाठी पाठीवर मिळणारी शाबासकी अन दहा वीस पैसे खूप जास्त होते. नंतर जेव्हा तर्क करू लागले तेव्हा ती कथाच कशी चुकीच्या पद्धतीने लिहिली हे समजलं. आजूबाजूच्या स्त्रियांना ती आपली कथा वाटायची कारण बहुतेक सर्वांना शिक्षण नाही वा नुसती अक्षरओळख, कमी वयात लग्न पण त्यांच्या भावाला मात्र घरच्यांनी शिकवले... शिक्षणाने खूप काही बदलतं.

मैत्रिणीसोबत माहेरच्या गप्पा मारल्या आणि मुली कितीही शिकल्या वा त्यांच्या घरी सुखात असल्या तरी, किती महत्त्वाचे असते माहेर नावाच घर याची जाणीव झाली. खरं तर घर तेच आहे पण रंगरंगोटी आणि सजावट यामुळे जवळपास वर्षभरानंतर वहिनी परत घरी रहायला आल्या. सगळं त्यांच्या आवडीने झाले असल्याने त्या जरा जास्तच खुश असणार यात शंका नाही. पण त्यांनी एकही फोटो मला काय पण सोशल मीडिया वर पण शेअर केला नाही. मी वारंवार व्हिडीओ कॉल वर घर पाहण्यासाठी प्रयत्न केला पण व्यर्थच. भाच्याला पण मला घराचे व्हिडीओ वा फोटो पाठवायला मनाई केली गेली. शेवटी मग नवीन वर्षाचे स्वागत सर्वांसोबत करायचे ठरवले. तिथे गेल्यावर समजलं की भावाने वहिनीला मला फोटो दाखवायला नाही म्हटलं होतं. मी घरी येवून स्वतः घर पहावं म्हणून सगळं... वहिनी तशी समजदार आहेच पण हे जरा जास्तच झालं, मला वाईट वाटलं की एवढं सजवलं पण माझ्यामुळे त्यांना डीपी पण नाही बदलता आला. मुलींना आपल्या घरी खरंच महत्व असावं म्हणजे मायबाप नसल्यावर सुद्धा माहेरघर उरतं. 

माझ्या बालपणी पुन्हा शाळा सुरू झाली की सगळ्या मैत्रिणी आत्या, मामा, मावशी, काका वा इतर कोणाकडे जाऊन काय मज्जा केली यावर बोलायच्या. मी मात्र कायम अश्या अनुभवापासून दूर. आईला एकच भाऊ अन बाबाला पण एकच भाऊ, मग वाटायचं आत्या / मावशी पाहिजे होती? गरिबांची लेकरं जरा लवकर समजदार होतात म्हणे, हळूहळू मला माझ्यापेक्षा आईचे वाईट वाटायचं. तिची कथा आटपाट नगराची. तिलाही वाटत असावं आपण जावे माहेराला?? तिला माहेरचं सुख नाही तर आम्हाला तरी काय ? पण ती अनेकांना मायेने योग्य मार्गदर्शन करायची, त्यामुळे सतत कुणीतरी घरी यायचे. एकदा असंच मला कोनी नातेवाईक नाही म्हणून मी रडली तर आपलंच घर बरं असते असे समजावत शेवटी म्हणाली की मला माय बहीण असती तर पाठवले असतं त्यांच्याकडं. 

असो, सासर वा माहेर याहीपेक्षा प्रत्येकाला विशेषतः त्या घरातील स्त्रीला ते घर "माझं" वाटणं महत्वाचे. नाहीतर काही दुखणे आले की जा आराम करायला माहेरी, असे नकोच. जिथं कुठे असो पण स्त्रीला सुख दुःख सगळं व्यक्त करता आले पाहिजे. तसं पाहिलं तर मुलं लहान असेपर्यंत असे माहेरी वा इतर ठिकाणी जाता येते पण एकदा का जबाबदाऱ्या वाढल्या की मग माहेरपण नुसतं दोन दिवसांचे पाहुनपण होऊन जाते. खरं तर आपल्या परंपरेने मुलगी माहेरी येणे म्हणजे खर्चिक बाब करून ठेवली आहे, म्हणजे तिला घ्यायला जाणे, साडीचोळी इत्यादी स्वागत. तिच्या जन्मापासून ती परक्याचे धन, लोकाच्या घरी जाणारं हे सगळेच तिला जन्मापासून परकं करून ठेवत असावं? एकदा का ती परकी ठरली तर मग तीचे हक्क अधिकार पण सहजपणे नाकारले जातात. अश्या अनेक बहिणी आहेत ज्यांनी वडिलोपार्जित संपत्तीचा हिस्सा घेतला म्हणून ती कायमची परकी झाली. संपत्ती वडिलोपार्जित वा स्वतः ची मिळकत, घर म्हणून ते सर्वांना आपलं वाटावं भलेही भाड्याच्या खोलीत राहत असलो तरी घर म्हणून मायेची ऊब सर्वांना मिळावी.

मंगळवार, २८ सप्टेंबर, २०२१

आठवणीतील सख्या...

आठवणी जाग्या झाल्या तर काल परवाची गोष्ट अन काळाच्या संदर्भात बोलायचं तर तब्बल पंधरा वर्षे...
तश्या आम्ही खुप खास मैत्रिणी. कुठेही दोघीच सोबत दिसायचो. कॉलेजच्या सुट्ट्यांचे दिवस सुद्धा आम्ही एकमेकींना पत्र लिहून सतत संपर्कात रहायचो. तिच्या वाढदिवसाला गिफ्ट माझेच अन पहिला फोनही माझाच, तो ही शेजारच्या लँडलाईन वर. 

कालांतराने थोड़ा बदल झाला. आम्ही पदवीचे शिक्षण घेत असतानाच ती एका मुलाच्या प्रेमात पडली. एवढ्या हुशार मुलीला धड दहावीत पास न होणारा, दारू पिणारा मुलगा आवडावा. तेही माझ्या सख्ख्या मैत्रिणीला😥. खुप वाईट वाटलं. पण पर्याय नव्हता. मैत्री तोडली तर कदाचित तीची वाट लागेल ही भिती. आता माझ्या ऐवजी त्याच्या पत्राची आणी भेटीची ती वाट पाहू लागली होती.

आम्ही एकाच वयाच्या तरी माझी समज माझ्या घरच्या वातावरणाची निर्मिती म्हणावी लागेल. आईकडे आजुबाजुच्या बायका आपली गार्‍हानी / घरच्या तक्रारी घेवुन यायच्या. (एम एस डब्लू ला आल्यावर समजले ते आईचे काउंसलिंग सेंटर होते, मोफत सल्ला केंद्र. आईकडे येनारया बाया अन आईचे सल्ले.. सोबत ठरलेले वाक्य यासाठी चांगले शिका लागते, शिक्षण आणि इज्जत खुप महत्वाची.) 

माझी मैत्रीण जेव्हा म्हणाली की आता 18 वर्षे पुर्ण झाली की लग्न करणार, तेव्हा मला धक्काच बसला. कारण आजुबाजुच्या समस्या या अश्याच लवकर लग्न अन मुले यामूळेच. खुप समजावले, शेवटी म्हटलं की मी स्वता येईल कोर्टात सही द्यायला पण आता नाही. निदान तो नाही तर तू तरी शिकलीच पाहिजे, नाहितर मी आणि बाकीचे सगळे शिकलेले, चांगल नाव असणार आणी तू काय करशील? हळूहळू तिच्याही लक्षात आलं. निदान भवितव्याच्या दृष्टीने विचार करुन शिक्षण महत्वाचं. मात्र ती ठाम, कितीही शिकली तरी लग्न याच्याशी करेल. शेवटी पहिल प्रेम. (या वयातल प्रेम म्हणजे अंधश्रद्धा😁😁 खात्री)

नंतर अजुन सहा वर्षे ती शिकत होती. यादरम्यान माझे क्षेत्र बदलले आणी शहर सुद्धा. तरिही आम्ही सम्पर्कात होतो. विशेष म्हणजे मी स्वता तिच्या सम्पर्कात राहिली. ती भविष्यात आर्थिकदृष्ट्या विसंबून असू नये, चांगले जिवन जगली पाहिजे यासाठी माझी धडपड.
ती शिकली, तिला समजले की ते फक्त आकर्षण होते, साहजिकच ते कमी झाले. त्याचा स्वभाव तिला समजला आणी प्रेम बीम ठीक पण लग्न नाही करायला पाहिजे. तिच्या घरच्यांच्या पेक्षा माझा राग. पहिला नाट मी लावला होता म्हणुन... 

ती नोकरी करायला लागली. निर्णय बदलला. 

शिक्षणाने समज वाढली आणी हळूहळू माझी गरज संपली. आता माझ्यामुळे काही अडत नव्हतेच. माझा नियम मी पाळला, जर आपल्यामुळं पुढच्या व्यक्तीचे काही अडत नसेल तर उगाच जागा अडवून ठेवू नये. नातं रक्ताचे असो वा मैत्रीचे नाहितर कामाचं ठिकाण जेव्हा आपली गरज नाही असं वाटतं तेव्हा तिथे उगाच थांबुन समोरच्याना जबरदस्तीने सोबत का द्यावी?
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