रविवार, २० एप्रिल, २०२५

नीति (आचार) - राष्ट्रपिता जोतीराव फुले

आज के इस धार्मिक द्वेष फैलाने वाले माहौल में, राष्ट्रपिता जोतीबा फुले के मुसलमान और इस्लाम के बारे में विचार जानना बहुत जरूरी है इसलिए उनके किताब से इसे लिख कर निकाला है।

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..... अब यदि कहो कि यह सारा अनर्थ क्यों और कैसे, तो थोड़ा सूक्ष्मा विचार करने से सहज ध्यान में आ जाएगा कि सारा अनर्थ भागवत और रामायण के कारण ही हुआ है!

प्रश्न: तो कुल सारे संसार में नीति (आचार) का आचरण करने वाले कोई नहीं है क्या?

उत्तर: ऐसा क्यों कहता है? मोहम्मद के धर्म में नीति अनुसार आचरण करके अपने सिरजमहार को संतुष्ट करने वाले बहुतेरे लोग हैं!

प्रश्न: किंतु मुसलमान लोगों ने तो कितने हैं मूर्तिपूजकों की बलात सुन्नत की और उनका धर्म बिगाड़ा है, इसलिए तो धूर्त आर्य ब्राह्मणों ने के द्वेष भरे ग्रंथों में लिखा मिलता है "न नीचो यवनात्पर:"। मुसलमान लोगों के कुरान को कोई न पढ़े, ना समझे इस हेतु से उन्होंने शास्त्रों में एक नियम ही बना डाला वह इस प्रकार से है " न वदेद्यावनी भाषां कण्ठे प्राणगते अपि।"

उत्तर: जो भी अज्ञानी मूर्तिपूजक पाखंडी आर्य भूदेव नटों के स्वार्थ भरे कृत्रिम धर्म के पाश में अटके हुए हैं, उनका उद्धार हो, इसलिए कई सारे धार्मिक जवांमर्द मुसलमान हथेली पर सिर रखते, तलवार की बल पर उन मूर्तिपूजको की अपनी तरह ही सुन्नत करते हैं -उन्हें "बिस्मिल्ला हिर रहिमान निर्रहीम" महापवित्र कलमा पढ़वाते हैं और उन्हें अपने सबके साथ धर्ममार्ग पर ले जाते हैं। क्योंकि मुहम्मदी लोगों के पवित्र ग्रंथ कुरान में बताया गया है कि सारे प्राणियों का निर्माणकर्ता खुद विशेष वह एक ही है और इसलिए वे उसे खुदा कहते हैं और उसे खुदा के बनाए हुए सभी इंसानों को आपस में भाई - भाई मानते हैं। इसी तरह कुल सारे मानवों को उनका पवित्र कुरान पढ़ने, देखने की तथा उसके अनुसार आचरण करने की छूट है। इसी तरह से सबको अपनी बराबरी का हक और उनके साथ रोटी - बेटी व्यवहार करने की अनुमति देते हैं। और अंतिम बात यह कि सब को पैदा करने वाले उस खुदा का आभार मानने के लिए उन्हें मस्जिद में अपने साथ लेकर बैठतें हैं। 

प्रश्न: यदि उनके पवित्र कुरान में ऐसा लिखा है कि कुल सारे मानव परस्पर एक दूसरे के भाई- बंधु माने और उसी प्रकार एक दूसरे से बरतें, तो फिर आर्यो के अथर्ववेद में भी इसी तरह का एक श्लोक है। वह इस प्रकार है:-

श्लोक
सहृदयं सांमनस्यम अविद्वेषं कृणोमि वः। 
अन्योन्य अभिहर्यत वत्संजातं इवाघ्न्या।
अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः। 
जाया पत्ये मधुवर्तीं वाचं वदतु शांतिवाम्।
मा भ्राता भ्रातारं द्विषद मा स्वसारं उत स्वसा।
सम्यंचः सव्रत: भूत्वा वाचं वदत भद्रया।

अर्थ:- तुम एकमत होकर एक ह्णदय रहो। कोई किसी से द्वेष ना करें । नवजात वत्स को देखकर जैसे गौ आनंदित होती है, तुम सब उसी भांति एक दूसरे से प्रेम करो। पुत्र पिता की आज्ञा का पालन करें, माता से एकमत होकर आचरण करें। पत्नी पति से एकता रखें और उससे सदा मधुर भाषण करें । भाई - बहनों में किसी प्रकार का द्वेषभाव न हो । इस प्रकार मीठी बोली बोल कर सब परस्पर एकता बनाए रखें।

प्रश्न: उन आर्यों के ग्रंथ में यदि ऐसा श्लोक था, और वे आज इस काल जो यह इस प्रकार का श्लोक अथर्ववेद में से निकाल दिखाते हैं, तो फिर निर्दयी आर्यों के शासन काल में वह जो शूद्रादि अतिशूद्रो को, म्लेंच्छ आदि लोगों को भिन्न- भिन्न जाति का मान कर उनको तुच्छ शुद्र माना जाता था और उन्हें अनेक प्रकार से सताया जाता था, वह सारी रीत क्या कहीं से अपने आप आ गई थी?

उत्तर: पहले काल से लेकर आज तक धूर्त आर्य ब्राह्मणों ने अपने अपवित्र रेशमी वस्त्र में वेदों को छुपा कर रखा था ना, इसी कारण ऐसा अनर्थ हो गया।

उत्तर: धूर्त आर्य ब्राह्मनों ने अपने पुराने काल में जिन शूद्रदि अतिशुद्रो को दास अनुदास बनाया था, उन्हें वे अपने वेदों का एक शब्द भी सुनने नहीं देते थे और आज अंग्रेज बहादुर के पक्षपातरहित राज्य में यह धूर्त आर्य अपने वेदों के वाक्यों को तुच्छ माने गए शुद्रादि अतिशुद्रो के पैरों में फेंक लुढ़का रहे हैं, जैसे कोई बेचारा लोटन कबूतर हो। किंतु अब उनका वह वेदरूपी काला चिथडा हम शुद्रादि अतिशुद्रो  के बीच नहीं चाहिए। दूर ही रखो उसे।

प्रश्न: अच्छा, वह कुछ भी क्यों ना हो, परंतु यह कहिए कि धर्मशील जवांमर्द मुसलमानों ने शुद्रादि अतिशुद्रो को धूर्त आर्य ब्राह्मनों की ढोंगी दासता से मुक्त क्यों नहीं कराया?

उत्तर: धूर्त आर्य ब्राह्मणों ने अपने रेशमी पवित्र वस्त्र में लपेटकर जिन वेदों को छिपाकर रखा था, मुसलमानों ने उन वेदों को खोज निकाला नहीं और उसमे जो जो झूठ कपट भरा था, खोज करके उन शुद्रादि अतिशुद्रो को मुसलमान नहीं बनाया, उन सब को अपने समान ही पवित्र मानवीय अधिकारों का उपभोग करने का अवसर नहीं दिया, यह उन सारे जोशीले मुसलमानों की भूल है। मैं स्वीकार करता हूं, यह उनसे भूल हुई है। इसी कारण तो यह सारा अनर्थ हुआ है।

प्रश्न: लगता है - उन मुट्ठी भर आर्य ब्राह्मणों के वेदों की जांच पड़ताल करने में आपके वे जवाँमर्द मुसलमान लोग आर्य धर्म के उन अति कोपी ऋषिगणों के शाप से डर गए होंगे।

उत्तर: मुसलमान लोग यदि उनके धूर्त आर्य ऋषियों के शाप से डरने वाले होते, तो वे आर्यों के सोरठी सोमनाथ की मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े ना कर पाते। परंतु हुआ यह कि मुसलमान लोग ऐश्वर्य के गर्व में कुछ मग्न हो गए और उधर अति कुशल मुकुंदराज, ज्ञानोबा, रामदास आदि ब्रह्मवृन्द के महाधूर्त साधुओंने यह किया कि उस कल्पित भागवत पुराण के कपटी चतुर्मुखी चतुराई वाले काले कृष्ण की कुतर्कभरी गीता में पार्थ अर्जुन को जो उपदेश दिया गया है, उसे आधार बनाया और प्राकृत देसी भाषा में विवेकसिंधु, ज्ञानेश्वरी, दासबोध आदि अनेक प्रकार से पाखंड भरे ग्रंथ रच डाले। इन सारी पाखंडी पोथीयों के कपट जाल में शिवाजी जैसे महावीर किंतु निरक्षर व्यक्ति को फसा दिया और उसे मुसलमानों से भिड़ने में और उनका पीछा करने में उलझा दिया। इसीलिए मुसलमान लोगों को कुल सारे महाधूर्त आर्यों का भंडाफोड़ करने की फुर्सत ही नहीं मिल पाई। यदि कहा जाए कि यह कहना गलत है, तो फिर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि जिस समय मुसलमान लोग इस देश में आए, ठीक उसी समय धुर्त आर्य मुकुंदराज के मन में शुद्रादि अतिशुद्रो के प्रति इतनी दया क्यों कर उमड़ पड़ी कि उसने देशी भाषा में विवेकसिंधु ग्रंथ की रचना क्यों की? इसके पीछे धूर्तता यह छिपी है कि कहीं अज्ञानी शुद्रादि अतिशुद्रो मुसलमान होकर धूर्त आर्य ब्राह्मणों के स्वार्थी धर्म की थूक्का फजीहत ना कर दे । सारांश यह - मुसलमान लोगों को इन महा धूर्त आर्य ब्राह्मणों का सारा रहस्य बाहर निकालने की फुर्सत मिल पाती, तो जैसे धुनिया धुन धुन कर कपास की धज्जियां उड़ा देता है, यों उन्होंने वेदों के साथ साथ आर्यों की कुल सारी पुस्तकों की धज्जियां उड़ा कर मटियामेट कर डाला होता।

प्रश्न: धूर्त आर्य ब्राह्मण मुसलमानों को या अन्यो को भी अपने पवित्र वेद बाहर निकाल कर दिखाते क्यों नहीं है? उन्हें पढ़ने से मनाई क्यों करते हैं? इसके पीछे रहस्य क्या है, यह यदि आप हमें बताएं तो उचित होगा।

उत्तर: धूर्त आर्य पंडितो ने हमें बड़ी कपट नीति चलाकर आज तक भी अपने खुंसत पुराने वेदों को बाहर नहीं निकाला है, इस कारण वे शुद्रादि अतिशुद्रो के साथ बड़े घमंड से अकड़ दिखा पाते हैं । यदि कहीं धूर्त आर्यों ने वेदों का अनुवाद अनुवाद करके सब लोगों के लिए प्रसिद्ध किया होता, तो अवश्य ही कुल सारे  शुद्रादि अतिशुद्रोने, म्लेच्छ आदि लोगों ने भी धूर्त पंडितों की बड़ी छिछलेदार की होती। उनसे बड़े चाव से मांग महार जाति वाले काम कराए होते। क्योंकि धूर्त आर्य ब्राह्मणों ने इस बलीस्थान में जब जब आक्रमण किए, हर बार उन्होंने यहां के मूल निवासियों क्षत्रियों को पाताल में गाड़ कर उन्हें किस किस तरह से सताया था । इस विषय का वेदों में कहीं उल्लेख मिलता है, सब कुल सारे  शुद्रादि अतिशुद्रो को जैसे ही आर्यों की चालबाजी समझ आयीं होती तो वह उनसे चोरी छुपे भी रोटी व्यवहार नहीं करेंगे। यही नहीं, मैं निश्चय से भविष्य कहता हूं, कि वह लोग आर्यों की छाया भी अपने शरीर पर पड़ने नहीं देंगे । वेदरूपी भैंस पानी में है, फिर यह धूर्त आर्य ब्राह्मण उसका मोल कैसे लगाते हैं ? कौन से गांव की रीत है यह है?

प्रश्न: तो फिर आप के मत से नीति किसे कहा जाए ?

उत्तर: हम सबके उत्पत्तिकर्ता को संतोष देने के लिए जो कोई भी सर्वजनहितकारी सत्य का भय मन में रखकर अन्य मानव बंधुओं के साथ वैसा ही आचरण करता हो, उसे ही नीति (आचार) कहना चाहिए, फिर ऐसा आचरण करने वाला चाहे ईसाई हो या मुसलमान हो, चाहे सत्यशोधक समाजी हो, अथवा गांव का कोई अनपढ़ गवार हो वह नीतिमान है।
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संदर्भ- नीति (आचार) के संदर्भ में यशवंत और जोतीराव फूले इनका संवाद

महात्मा जोतीराव फुले समस्त साहित्य 2 
"सार्वजनिक सत्य धर्म पुस्तक" 
हिंदी अनुवाद प्रा. वेदकुमार वेदालंकार 
महात्मा फुले चरित्र साधने प्रकाशन समिति

आस्तिक

आम्ही सगळेच भुकेनं व्याकुळ
जेवणाचं ताट समोर आलं
पोट भरलं 
अन 
त्यांनी समाधान व्यक्त करत देवांचे आभार मानले
उन्हातान्हात राबणाऱ्या शेतकऱ्यांना मी कृतज्ञता व्यक्त केली....
माझ्याकडे बघत ते सगळे एका सुरात बोलले
तुझ्यासारख्या लोकांमुळे देशात अनर्थ होतोय, नरकात जाशील...
???
निःशब्द

गुरुवार, ९ जानेवारी, २०२५

बालपण आणि शिक्षण

'मम्मा, तुला माहित आहे का सैटर्न (आपला शनी😀) इतका हलका आहे की तो पाण्यावर सहज तरंगु शकतो'. ऑ, खरच.. अस म्हणत मी फक्त आश्चर्यकारक चेहरा करायचा. नेहमीप्रमाणे तीचे बोलणे ऐकत होती. ती पुढे बोलू लागली, 'त्याला रिंग असल्याने तो आपल्या सगळ्या प्लेनेटमध्ये सुंदर दिसतो. तसे सगळेच प्लेनेट सुंदरच आहेत, जसे सगळे रंग असतात...' आपले बोलून ती परत नव्या खेळात गुंतली अन मी माझ्या बालपणात रमली. 

मला शनिची ओळख कशी झाली असेल? कदाचित शनिवारी नख, केस कापू नये अशी? की अमक्या तमक्याला शनी लागलाय अशी ? शनी शांत करण्यासाठी शनिवारी उपवास करावा लागतोय, त्याला तेल द्यावे लागते अश्या माहितीने? आठवतं का काही, स्वतालाच विचारु लागली. 

जाऊ देत, गाथाला माहित झालेला शनी खुप वेगळा आहे. कदाचित सगळ्यानाच असे आपले ग्रहतारे कळले असते तर... मात्र आपल्याला ओळख होते ते आपल्या कुंडलिच्या ग्रहांची अन खेळ सुरु होतो राशी अन कोणत्या राशीला कोणता ग्रह भारी याच्या भीतीचा.. 
मात्र जरी असे झालं तरी की सौर मन्डळ आधी शिकलो तर खरंच भय राहिलं नसतं? 

मग येवढे साइंस, विज्ञान का सौर मंडळचा अभ्यास करणारे यांना भिती दिसते ती कश्यामूळे? मंगळावर वा चंद्रावर माणुस पोहोचला, येवढे शोध लावलेत पण काय यापैकी कुणीच इतकं 'पुन्यवान' नसावं की स्वर्गांत जावून सगळं सगळं शोधून, फोटो काढुन खाली पाठवतील? 

माझ्यासारखीच अनेकाना नव्हे तर किंबहुना सर्वानाच मृत्यूची ओळख झाली ती माणुस मेल्यावर एक तर भूत बनतो नाहीतर पुण्यवान असेल तर स्वर्गात जातात. माझ्या लेकीने मानवी हाडाचा सापळा पाहिला तो म्यूजियममध्ये. कोणत्यातरी हेलोवीनच्या वीडियो मध्ये, तेही केवळ त्या सणाला पोशाख म्हणुन फनी makeup असतो, हेच तीला माहिती. 

मागील महिन्यात तीचे आजोबा गेले आणि नंतर ती एक दिवस सांगत होती की, कुणी मेले की खुप खुप दिवसानी त्याचे स्केलेटन/ सापळा बनतो. कधी कधी तिला आजोबा आठवले तर ती नाराज होतेच पण त्यांच वय झाले होते, ते आजारी होते म्हणून त्यांची एनर्जी संपली हे तिला माहीत आहे. एक दिवस सगळ्यांची एनर्जी पुर्ण नष्ट होते, हे निसर्गचक्र आहे म्हणे...  ती बोलते अन मी नुसत्या कल्पनेने शांत होते.

मला लहानपणी काय माहीत होतं? सकाळी आकाशात सूर्य असतो अन रात्रि चंद्र तारे हेच अनेक वर्षे असलेले ज्ञान. खुप उशिरा समजले की दिवसा पण चंद्र तारे असतात पण सूर्याच्या प्रखर प्रकाशामूळे आपल्याला दिसत नाही. आम्ही मात्र शिकलो, देवान लहानपनीच सूर्य गिळायला झेप घेतली... आता मोठी माणसं सांगतात तर खरच असेल हा विश्वास.

असो, माणुस अन सगळे जीवच नाहीतर कदाचित आपली पृथ्वी जो एकमेव ग्रह आहे की ज्यावर माणुस अन अन्य जिवंत राहू शकतात, ते सुद्धा नष्ट होईल? 800 मिलियन  वर्षापूर्वी आपल्या मदर अर्थ वर सुद्धा कोणता जीव नव्हताच, ते सगळ हळुहळु विकसित झाले.... गाथा पुरानानुसार 😊😊 जे जे निर्माण होते ते नष्ट होणारच

अजून तरी तिला भूताची भिती नाही कारण ते फक्त कार्टून किन्वा इमैजिनेशन म्हणजे कल्पना आहे यावर ती ठाम आहे. तिला भूत नाही तर मेल्यावर हाडाचा सापळाच होतो जो काहिच करु शकत नाही हे माहीत आहे. मला मात्र लहानपणी बाहेर अंधारात भूत आहेच, स्मशानाच्या रस्त्याने भूत असते हे इतकं बिंबवले आहे की, आजही भूताचे सिनेमे पाहणार नाही 😀😀. भूत नसते हे मान्य पण मनाला कोण सांगेल. 

असो, मातृभाषेत शिकले पाहिजे असं मलाही वाटतं पण भाषा कोणती यापेक्षा वैज्ञानिक दृष्टिकोन आणि शिकण्यात आवड, इंटरेस्ट ज्यात निर्माण होतो ते शिक्षण, ती भाषा, ते माध्यम महत्वाचं.

बुधवार, ६ एप्रिल, २०२२

मानसिकता जवळपास सारखीच...

काही दिवसांपूर्वी आमच्या बिल्डिंगच्या गेटजवळ एक चारचाकी थांबली. 7/8 वर्षांच्या मुलासोबत त्याचे आईवडील आणि आजी गाडीतून उतरले. गेटमधून आत आले आणि तो छोटा मुलगा परत मागे वळला. गेटच्या बाहेर जाऊन आवाराच्या भिंतीकडे तोंड करून त्याने लघवी केली. तोपर्यंत त्याचे आईवडील घरात पोहचले होते. पहिल्या मजल्यावर असलेल्या कुटुंबाकडे ते पाहुणे म्हणून आले होते. खर तर, पहिल्याच मजल्यावर जायचं होतं, गेटबाहेर करण्यापेक्षा तो मुलगा धावत पळत वर जाऊन बाथरूममध्ये पण जाऊ शकत होता. त्याच्या मामाचं घर आहे, नेहमी येत असतो तो इकडे पण... सामाजीकरण / Socialisation सुरवातीला घरातून होते, असे म्हणतात मग या गोष्टींचा समावेश बहुतेक घरात होत नसावा. बागेत सुद्धा आया आपल्या मुलांना सहज बोलतात जा तिकडे कर, जेव्हा की व्यवस्थित सोय केलेली असते. आणि मग पुरुष जेव्हा असे कुठेही भिंतीकडे तोंड करून उभे दिसले की म्हणायचं की पुरुषांना लाज वाटत नाही... असल्या कृतीचं समर्थन मुळीच नाही पण ज्या समाजीकरणाच्या प्रक्रियेत मुली/ महिला घडविल्या जातात, अगदी तसेच मुलं/ पुरुष पण घडविले जातात. फक्त मुलींना बंधन शिकविली जातात तर मुलांना निर्लज्ज वागणं? 

घटना एक

काल परवाचीच घटना, आम्ही दोघी मायलेकी आमच्या ओळखीच्या घरी गेलो होतो. माझ्या लेकीपेक्षा एक वर्षे मोठा असलेला मुलगा, आई गृहिणी पण इंजिनिअरची डिग्री असलेली तर वडील कॉलेजमध्ये शिकवणारे. आमच्या गप्पा सुरु असतांना ही दोन्ही मुले आम्ही बसलो त्याच हॉलमध्ये आमच्या समोर खेळत होती. पाच वाजत आले आणि ऊन जरा कमी झाले म्हणून समोरचे दार उघडलं आणि ही दोन्ही पोरं अंगणात खेळू लागली. फक्त गेटच्या आत खेळा असे सांगून आम्ही हॉलमध्येच बसलो होतो. काही वेळाने माझी लेक आत येऊन मला म्हणाली, त्याला असं काय आहे? त्याने पकडून कुंडीतील झाडावर सु सु केली.. पहिल्यांदाच पाहिलं म्हणून तिला प्रश्न पडणे साहजिकच होतं. तिला तर सांगितले पण त्या मुलाच्या आईला सांगितलं की मुलांना याच वयात अश्या गोष्टींचं योग्य वळण लावलं पाहिजे. तर लगेच त्या मुलाची आजी ( तिची आई )भडकली, आम्ही काय त्याला बाहेर मुतायला शिकवतो काय? आता बाहेर एवढे लोकं करतात तर आम्ही घरात येतो. मोठा झाला की कळेल त्याला... सगळ्यात महत्त्वाचं म्हणजे ती म्हणाली की आमच्या पोराला सांगण्यापेक्षा तुझ्या पोरीला सांग ना की कोणी अस मुतत असेल तर तिकडे पाहू नको... अर्धी दुनिया असे करते, कोणाकोणाला सांगशील... खरं तर मी त्यांच्या घरी पाहुणी तरी ती बाई येवढं बोलली, समजा दुसरं कोणी असते तर? यात एक गोष्ट म्हणजे हे सर्व बोलणं होत असताना त्या मुलाची आई मात्र शांत होती.

घटना दोन

एका एनजीओमध्ये बेघर मुलांसोबत काम करणारी बारावीपर्यंत शिकलेली धार्मिक घरातील मैत्रीण. अश्या धार्मिक लोकांकडे असते तसे तिच्या घरी सुद्धा एका बापूचे पूजन व्हायचं. त्याच्या सत्संगाला जाणारी ही मंडळी. त्यांच्या घरी त्याच्या फोटोचं रोज पूजन व्हायचं, आणि त्या स्वयंघोषित संतावर स्त्रियांच्या शोषणाचे आरोप झाले. त्याला पोलीस कस्टडी आणि नंतर कारागृहात रवानगी झाली. त्यानंतर तिच्या घरी तो फोटो अन पूजन दिसलं, तिला विचारले असता ती म्हणाली, तो पुरुष आहे, तो नालायक आहे पण या स्त्रिया का जवळ जातात? कुणी स्वताहून तर असं काही करणार नाही, बायांना समजत नाही का या माणसाची नियत खराब आहे? सस्तंग ऐकावं, प्रसाद घ्यावा, गर्दी असेल तेव्हाच रहावं तिथे मग कुणाची हिम्मत होईल. बाया लगट करतात मग त्याला संधी भेटल्यावर तो कश्याला सोडेल? बापू, संत महात्मा असला तरी, आहे तर पुरूष....

घटना तीन

पदव्युत्तर शिक्षण घेतलेली. चार पुस्तके वाचलेली आणि चार पुस्तके लिहिलेली लेखिका. समाजमाध्यमातून संपर्कात आलेली. खूप हुशार, समजदार, अनेक कलागुणांना अंगी बाळगून असलेली मैत्रीण. मताधिकार वापरू शकतो म्हणजे तरुण असलेल्या एका मुलाची आई. नवऱ्याच्या जाचाला कंटाळून पाच सहा वर्षांपासून कायदेशीर वेगळी झालेली. चारेक वर्षांपूर्वी शांत जीवनाच्या शोधात एका महिन्यासाठी तीने (भिक्खू) श्रामणेरी दीक्षा घेतली होती. त्याच दरम्यान तिच्यापेक्षा 6/7 वर्षे वयाने लहान, अविवाहित उच्च शिक्षित तरुण श्रामणेर तिच्या संपर्कात आला. विश्वास, प्रेम आणि नंतरच्या काळात त्यांनी लग्न केले. ती सर्वसामान्य जीवन जगत आहे तर तो अजूनही चिवर धारण करून आहे. जेव्हा त्याला तिला भेटायला यायचं असते तेव्हा तो सर्वसामान्य कपडे घालून येतो. मला कायम वाटतं की तो ज्या बुद्ध धम्म परंपरेला मानतो म्हणजे चिवर धारण केले आहे आणि त्या पवित्र वस्त्राचा अपमान करतो याचा अर्थ तो तिलाही धोका देत असावा. पण एक दिवस चर्चा सुरू असताना ती म्हणाली की, बाया काही कमी नसतात, त्यांनी चिवर घातले पण देखणे तरुण आहेत म्हणून काही बाया स्वताहून त्यांना व्हिडिओवर आपले शरीर उघडे करून दाखवतात. मला वाटलं त्याने असेच सांगितले असेल तर ती म्हणाली की तिने स्वता त्याच्या मोबाईल मध्ये त्या बायांचे स्क्रीनशॉट बघितले. त्याने तिला दाखवण्यासाठी ठेवले होते म्हणे. तिच्या बोलण्याने मला वाईट नाही तर तिच्या विचाराची कीव आली. एवढी शिकलेली, लेखिका कवयित्री आणि ती म्हणते, ' चिवर जरी अंगावर असलं तरी आहे तर तो पुरुष, शारीरिक गरज,  लैंगिक भावना आहेत त्याला...
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तुम्हालाही असे अनुभव आणि त्यामुळे मनात निर्माण आहेतच..

शुक्रवार, १४ जानेवारी, २०२२

कोरोना महामारी, लॉक डाऊन, शाळाबाह्य मुलांचा प्रश्न

 कोरोना महामारी, लॉक डाऊन, शाळाबाह्य मुलांचा प्रश्न

कोरोना महामारी व लॉक डाऊन च्या या काळात अनेक प्रकारांनी आपण त्रासलोय. अनेकांचे भरुन न  येणारे नुकसान झाले आहे. तर काहींसाठी लॉकडाउन मौजमजा आहे. एकीकडे काहींसाठी वर्क फ्रॉम होम ची सुविधा आहे. तर दुसरीकडे बहुसंख्य जनतेचे मात्र केवळ हाल आहेत. पोटा-पाण्याचा प्रश्न आहे.

या काळात सर्वांनाच समस्यांना सामोरे जावे लागत आहे. काहींचे काम बंद झाले, काहींचे पगार झाले नाहीत. जे काही नुकसान झाले ते झेलण्याची तयारी पण झाली. पण सर्वात जास्त नुकसान शैक्षणिक क्षेत्रात झालेले दिसून येत आहे. ज्यांच्याकडे सोयीसुविधा आहे त्यानी आपल्या पाल्यांच्या ऑनलाइन क्लासेस च्या माध्यामातून शिक्षणाचा प्रश्न सोडावयाचा प्रयत्न केला. यातूनच इंटरनेट चा अति वापर आणि पुढे याचाच गैरवापर असे प्रश्न निर्माण झाले आहेत. ज्यांच्याकडे साधा फोन देखील नाही अशी मुले मात्र शाळा सुरु होण्याची वाट पहात आहेत.

अशी मुले शिक्षणापासून दुर होतील काय? ही भीती वाटत राहते. तसाही आपल्या देशात शाळाबाह्य मुलांचा मोठा प्रश्न आधीपासूनच आहे. दरवर्षी त्यात वाढ होते. यात आता लॉक डाऊन मुळे शाळा बंदी. सर्व मुलांबद्दल काळजी करावी अशी स्थिती आहे.

माहेरघर

मी म्हटलं, भावाच्या घरी आलेय. वर जाताजाता नेमकं तेच वहिनीला ऐकायला गेले... अरचू, भावाचे घर नाही, माहेरी आले म्हणा, शब्द महत्त्वाचे असतात... माहेरचा किस्सा मैत्रिणीला सांगत होती, ती म्हणाली, "कुछ भी बोल यार, भाई तो अच्छे हैं तेरे लेकिन दोनों भाभी भी अच्छी मिली.. तू बहुत लकी है ! बहुत नेक काम किए होंगे.....  मी जास्त काही बोलणार इतक्यात परत तीच म्हणाली, "तो हमने कौन से बुरे काम किए हैं..." अग, तुझे माहेर जवळ आहे एका गावात म्हणून असं म्हणत आम्ही विषय थांबविला. 

मी भाग्य वैगेरे मानत नाही. तिचा फोन ठेवल्यावर अनेक चेहरे आठवले, खूप चांगली माणसं तरीही कठीण प्रसंगी एकटीच असलेली. आपली मायेची माणसं असावी असे बहुतेक सर्वांना वाटत असेल, अगदी जवळ नसली तरी चालेल पण असावी. आटपाट नगराची गोष्ट आठवली? श्रीमंत भाऊ आणि गरीब बहिणीची. माझ्या बालपणी पुस्तके विकत घेण्याइतपत श्रीमंती नव्हती. आई वडिलांच्या कृपेने हुशारी जन्मजात मिळाली, मग काय? जे मास्तर शाळेत शिकवत ते सहज पाठ व्हायचं. बालवाडीत तर साऱ्या गावातील पोरं जमली तरी जो पर्यंत मी दिसत नव्हती बाईला शाळा भरल्यासारखे वाटत नव्हतं म्हणे. तेव्हापासून सवय, कोणीही म्हटलं ते गाणं / कविता म्हणून दाखव, आपलं सादरीकरण सुरू व्हायचं. आटपाट नगरच्या कथेने तर लय प्रसिद्ध केले होते. पैसे पण द्यायच्या आयाबाया. माझ्या आईसारखे अनेकांना ती आपलीच कथा वाटायची. त्यांच्या भावना कदाचित तेव्हा मला समजत नव्हत्या. माझ्यासाठी पाठीवर मिळणारी शाबासकी अन दहा वीस पैसे खूप जास्त होते. नंतर जेव्हा तर्क करू लागले तेव्हा ती कथाच कशी चुकीच्या पद्धतीने लिहिली हे समजलं. आजूबाजूच्या स्त्रियांना ती आपली कथा वाटायची कारण बहुतेक सर्वांना शिक्षण नाही वा नुसती अक्षरओळख, कमी वयात लग्न पण त्यांच्या भावाला मात्र घरच्यांनी शिकवले... शिक्षणाने खूप काही बदलतं.

मैत्रिणीसोबत माहेरच्या गप्पा मारल्या आणि मुली कितीही शिकल्या वा त्यांच्या घरी सुखात असल्या तरी, किती महत्त्वाचे असते माहेर नावाच घर याची जाणीव झाली. खरं तर घर तेच आहे पण रंगरंगोटी आणि सजावट यामुळे जवळपास वर्षभरानंतर वहिनी परत घरी रहायला आल्या. सगळं त्यांच्या आवडीने झाले असल्याने त्या जरा जास्तच खुश असणार यात शंका नाही. पण त्यांनी एकही फोटो मला काय पण सोशल मीडिया वर पण शेअर केला नाही. मी वारंवार व्हिडीओ कॉल वर घर पाहण्यासाठी प्रयत्न केला पण व्यर्थच. भाच्याला पण मला घराचे व्हिडीओ वा फोटो पाठवायला मनाई केली गेली. शेवटी मग नवीन वर्षाचे स्वागत सर्वांसोबत करायचे ठरवले. तिथे गेल्यावर समजलं की भावाने वहिनीला मला फोटो दाखवायला नाही म्हटलं होतं. मी घरी येवून स्वतः घर पहावं म्हणून सगळं... वहिनी तशी समजदार आहेच पण हे जरा जास्तच झालं, मला वाईट वाटलं की एवढं सजवलं पण माझ्यामुळे त्यांना डीपी पण नाही बदलता आला. मुलींना आपल्या घरी खरंच महत्व असावं म्हणजे मायबाप नसल्यावर सुद्धा माहेरघर उरतं. 

माझ्या बालपणी पुन्हा शाळा सुरू झाली की सगळ्या मैत्रिणी आत्या, मामा, मावशी, काका वा इतर कोणाकडे जाऊन काय मज्जा केली यावर बोलायच्या. मी मात्र कायम अश्या अनुभवापासून दूर. आईला एकच भाऊ अन बाबाला पण एकच भाऊ, मग वाटायचं आत्या / मावशी पाहिजे होती? गरिबांची लेकरं जरा लवकर समजदार होतात म्हणे, हळूहळू मला माझ्यापेक्षा आईचे वाईट वाटायचं. तिची कथा आटपाट नगराची. तिलाही वाटत असावं आपण जावे माहेराला?? तिला माहेरचं सुख नाही तर आम्हाला तरी काय ? पण ती अनेकांना मायेने योग्य मार्गदर्शन करायची, त्यामुळे सतत कुणीतरी घरी यायचे. एकदा असंच मला कोनी नातेवाईक नाही म्हणून मी रडली तर आपलंच घर बरं असते असे समजावत शेवटी म्हणाली की मला माय बहीण असती तर पाठवले असतं त्यांच्याकडं. 

असो, सासर वा माहेर याहीपेक्षा प्रत्येकाला विशेषतः त्या घरातील स्त्रीला ते घर "माझं" वाटणं महत्वाचे. नाहीतर काही दुखणे आले की जा आराम करायला माहेरी, असे नकोच. जिथं कुठे असो पण स्त्रीला सुख दुःख सगळं व्यक्त करता आले पाहिजे. तसं पाहिलं तर मुलं लहान असेपर्यंत असे माहेरी वा इतर ठिकाणी जाता येते पण एकदा का जबाबदाऱ्या वाढल्या की मग माहेरपण नुसतं दोन दिवसांचे पाहुनपण होऊन जाते. खरं तर आपल्या परंपरेने मुलगी माहेरी येणे म्हणजे खर्चिक बाब करून ठेवली आहे, म्हणजे तिला घ्यायला जाणे, साडीचोळी इत्यादी स्वागत. तिच्या जन्मापासून ती परक्याचे धन, लोकाच्या घरी जाणारं हे सगळेच तिला जन्मापासून परकं करून ठेवत असावं? एकदा का ती परकी ठरली तर मग तीचे हक्क अधिकार पण सहजपणे नाकारले जातात. अश्या अनेक बहिणी आहेत ज्यांनी वडिलोपार्जित संपत्तीचा हिस्सा घेतला म्हणून ती कायमची परकी झाली. संपत्ती वडिलोपार्जित वा स्वतः ची मिळकत, घर म्हणून ते सर्वांना आपलं वाटावं भलेही भाड्याच्या खोलीत राहत असलो तरी घर म्हणून मायेची ऊब सर्वांना मिळावी.

मंगळवार, २८ सप्टेंबर, २०२१

आठवणीतील सख्या...

आठवणी जाग्या झाल्या तर काल परवाची गोष्ट अन काळाच्या संदर्भात बोलायचं तर तब्बल पंधरा वर्षे...
तश्या आम्ही खुप खास मैत्रिणी. कुठेही दोघीच सोबत दिसायचो. कॉलेजच्या सुट्ट्यांचे दिवस सुद्धा आम्ही एकमेकींना पत्र लिहून सतत संपर्कात रहायचो. तिच्या वाढदिवसाला गिफ्ट माझेच अन पहिला फोनही माझाच, तो ही शेजारच्या लँडलाईन वर. 

कालांतराने थोड़ा बदल झाला. आम्ही पदवीचे शिक्षण घेत असतानाच ती एका मुलाच्या प्रेमात पडली. एवढ्या हुशार मुलीला धड दहावीत पास न होणारा, दारू पिणारा मुलगा आवडावा. तेही माझ्या सख्ख्या मैत्रिणीला😥. खुप वाईट वाटलं. पण पर्याय नव्हता. मैत्री तोडली तर कदाचित तीची वाट लागेल ही भिती. आता माझ्या ऐवजी त्याच्या पत्राची आणी भेटीची ती वाट पाहू लागली होती.

आम्ही एकाच वयाच्या तरी माझी समज माझ्या घरच्या वातावरणाची निर्मिती म्हणावी लागेल. आईकडे आजुबाजुच्या बायका आपली गार्‍हानी / घरच्या तक्रारी घेवुन यायच्या. (एम एस डब्लू ला आल्यावर समजले ते आईचे काउंसलिंग सेंटर होते, मोफत सल्ला केंद्र. आईकडे येनारया बाया अन आईचे सल्ले.. सोबत ठरलेले वाक्य यासाठी चांगले शिका लागते, शिक्षण आणि इज्जत खुप महत्वाची.) 

माझी मैत्रीण जेव्हा म्हणाली की आता 18 वर्षे पुर्ण झाली की लग्न करणार, तेव्हा मला धक्काच बसला. कारण आजुबाजुच्या समस्या या अश्याच लवकर लग्न अन मुले यामूळेच. खुप समजावले, शेवटी म्हटलं की मी स्वता येईल कोर्टात सही द्यायला पण आता नाही. निदान तो नाही तर तू तरी शिकलीच पाहिजे, नाहितर मी आणि बाकीचे सगळे शिकलेले, चांगल नाव असणार आणी तू काय करशील? हळूहळू तिच्याही लक्षात आलं. निदान भवितव्याच्या दृष्टीने विचार करुन शिक्षण महत्वाचं. मात्र ती ठाम, कितीही शिकली तरी लग्न याच्याशी करेल. शेवटी पहिल प्रेम. (या वयातल प्रेम म्हणजे अंधश्रद्धा😁😁 खात्री)

नंतर अजुन सहा वर्षे ती शिकत होती. यादरम्यान माझे क्षेत्र बदलले आणी शहर सुद्धा. तरिही आम्ही सम्पर्कात होतो. विशेष म्हणजे मी स्वता तिच्या सम्पर्कात राहिली. ती भविष्यात आर्थिकदृष्ट्या विसंबून असू नये, चांगले जिवन जगली पाहिजे यासाठी माझी धडपड.
ती शिकली, तिला समजले की ते फक्त आकर्षण होते, साहजिकच ते कमी झाले. त्याचा स्वभाव तिला समजला आणी प्रेम बीम ठीक पण लग्न नाही करायला पाहिजे. तिच्या घरच्यांच्या पेक्षा माझा राग. पहिला नाट मी लावला होता म्हणुन... 

ती नोकरी करायला लागली. निर्णय बदलला. 

शिक्षणाने समज वाढली आणी हळूहळू माझी गरज संपली. आता माझ्यामुळे काही अडत नव्हतेच. माझा नियम मी पाळला, जर आपल्यामुळं पुढच्या व्यक्तीचे काही अडत नसेल तर उगाच जागा अडवून ठेवू नये. नातं रक्ताचे असो वा मैत्रीचे नाहितर कामाचं ठिकाण जेव्हा आपली गरज नाही असं वाटतं तेव्हा तिथे उगाच थांबुन समोरच्याना जबरदस्तीने सोबत का द्यावी?
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बुधवार, २८ जुलै, २०२१

आणि भुतदया नडली...


प्रत्येकाच्या संसाराची सजावट ही कायम लक्षात राहते, अगदी सुरवातीचे दिवस... असंख्य आठवणी.. कोणते सामान कधी अन कसे घेतले ? तेव्हा आलेल्या अडचणी आणी बरेच काही.

तशी यावर कधी विशेष चर्चा होत नाही पण काही गोष्टी मात्र अचानक आठवतात. माझ्यासारख्या भावनिक व्यक्तीला तर रडायला पण येते. गेले दोन दिवस असेच एक एक आठवत आहे. 

आमच्या कामाचा एरिया जवळ व्हावा म्हणून ज्यांचे घर ऑफ़िस साठी भाड्याने घेतले होते, तेथेच वरच्या दोन खोल्या रिकाम्या झाल्या आणि मागचा पुढचा विचार न करता आम्ही ती जागा रहायला घेतली. लग्नाला जेमतेम दिड वर्षे होत आले होते. आई पाहणी करण्यासाठी पाहुणी म्हणून आलेली. आम्ही ज्या ठिकाणी राहत होतो त्या खोल्याना सिमेंटची पत्रे होती. आमच्याकडे पंखा नाही की कुलर नाही. 

यापूर्वी जिथे रहायचो ते घर मोठं आणि फ्लैट असल्याने पंखे वैगेरे सगळे ठीक होत. घरी पंखा असला पाहिजे हा विचार करायला वेळ अन पैसा दोन्ही नव्हता. तसा आमचा संसार पाहून ती खूश होती. सन्स्था नविन असली तरी काम पाहून अजुन तिला जरा जास्त आनंद झाला होता.

दुसर्या दिवशी बाहेर फिरायला गेली आणी येताना घरी लागणारं काही सामान घेवुन आली. पंखा पण आणला. भिंतीवर लावायचा. काही बोलली नाही. मी पण शांतच राहिले... तो उन्हाळा त्या पंख्याने सुसह्य केला म्हणायला हरकत नाही.

आता गेली साडेतीन वर्षे आमच्याकडे टीवी नाही. गाथा टीवी एंकरसोबत गप्पा मारायला लागली होती. मग काय ? बंद केला आणी किती दिवस बंद ठेवायचा या विचाराने माझ्या सखीला दिला.

लग्नानंतर जवळपास दोन वर्षं टीवी नव्हता आणि आम्हाला गरज पण वाटली नव्हतीच. पण आमचे दादा म्हणजे माझे मोठे दीर(घरी सगळे त्याना दादाच बोलतात) एकदा कर्जत वरुन आले. नविन टीवी आणी त्याची फिटिंग करुन देणारा माणुस घेवुन. नंतर केबलवाल्याकडे जावुन केबल पण बसवून घेतली. गरज नसली तरी टीवी आला आणी मग गरज बनला. टीवी अन पंखा सोडला तर बर्यापैकी सामान आम्ही दोघानी खरेदी केलेले.

जे सामान मला गरजेचे असेल कदाचीत दुसरया कुनाला ते सोईसाठी वाटेल. आम्हा दोघानाही कपडे धुण्याचे मशीन सगळ्यात गरजेचं आहे असे वाटले होते. पण घेणार कसं? जवळपास एक किलोमीटर अंतरावर माझे मोठे दीर रहायचे. ताई पण बोलताना म्हनाल्या की नविन मशीन घ्यायचं आहे. मग काय नवर्याला सान्गितलं दादांशी बोला. म्हनाव, हफ्ता देईल वेळेवर एक नाही तर दोन मशिनी घे. हफ्ताने परतफेड झाली मशीन घरी आली. पानी येण्याची वेळ खुप विचित्र होती, आम्ही बाहेर असायची पण ऑटोमेटिक मशीन असल्याने कपडे धुऊन तयार रहायचे.

या आठवड्यात दोन तीन दिवस पाण्याची कमतरता होती. पानी साठवायला काहिच सोय नाही. मग मशीन मध्ये पानी भरुन ठेवले. झाले... काल मशीन सुरु करते तर काहिच प्रतिसाद नाही. काहिच सुचत नव्हतं. तेव्हा कळलं की ही मशीन माझ्यासाठी किती महत्वाची आहे. जर मशीन दुरुस्त नाही झाली तर... नुसत्या विचाराने डोळ्यांत पाणी.. आम्ही एकमताने सोबत घेतलेली पहिली वस्तू म्हणजे ही मशीन..
मैकेनिक ला फोन केला. बघीतलं तर उंदरांने आतमधील वायर सगळी कुरतडली होती. 
उंदिर? बापरे म्हणजे पक्ष्याना पिण्याचे पाणी आणी खायला ठेवते.. तर.. त्या पक्षी अन खारूताई सोबत उंदिर पण येतात तर? 
चारएक हजार खर्च येईल. बापरे? मनात आलं महिनाअखेर, खाते रिकामे.. पण.. मशीन नसेल तर? बाकी एवढे काम करते ते काय कमी आहेत की काय? माझ्या हातचे कपडेधुलाई व्यवस्थीत नाही. काहीही झाले तरी मशीन दुरुस्त झाले पाहिजे. बस्स..

गुरुवार, २४ जून, २०२१

टेकू आणि झाड



पावसाळा सुरू झाला की कुत्र्याच्या छत्र्या आणि टेकू बऱ्यापैकी सर्वत्र दिसतात. जसजशी माहितीत भर पडली तेव्हा कळले कुत्र्याची छत्री नव्हे तर इंग्रजीतील मशरूम आहेत! या पावसात वाढतात व काही दिवसात संपतात. आणि टेकू? सांगते! घरी आई कारले, वाल अशी वेल लावित असे. बिया पेरल्या, कोंब आले, पाने फुटली कि त्यांना लगेच 'टेकू'च्या सहय्याने तो वेल मांडवावर पोहचवला जाई. लहानपणी या कुत्र्याच्या छत्र्या व टेकू यांचे फार कौतूक वाटायचे.  

हा 'टेकू' जोपर्यंत तो वेल मांडवावर व्यवस्थित जात नाही तोपर्यंत या 'टेकू'चे फार महत्व. त्याची वेल वर जाईपर्यंत विशेष काळजी पण घेतली जायची. पण एकदा का वेल वर मांडवावर पोहोचला रे पोहचला आणि त्याला टेकूची गरज नाही, असे दिसले की मग त्याच्याकडे कुणाचे फारसे लक्ष जात नसे. 'टेकू' कधी 'पडला' हे ही कधी कधी समजत नव्हते!
 
असे असले तरी 'टेकू' फार महत्त्वाचा. वादळी वारे वा जोरदार पावसाने जेव्हा रोपटी वा फांद्या तुटल्या जातात तेव्हा हे टेकू मदतीला असतात. एखाद्याचे घराचे छत कमजोर झाले, पडायला आले तर मजबूत बल्ली किंवा मेढ 'टेकू' म्हणून वापरतात. या बल्लीला म्हणजे 'टेकू'ला कोणी टेकून राहणे तर दूरच पण त्याच्या जवळ ही भटकत नाही. घराला झाडून साफ करताना वा सारवन करताना सुद्धा किती या 'टेकू'ची काळजी! 

घराच्या बाबतीत मात्र या 'टेकू'ला जरा जास्त महत्त्व दिले जाते. पडके घर आणि टेकू यांचे नाते अतूट. 'टेकू' काढला तर घर पूर्ण पडेल. मग घर पडले तर काय? टेकू आपोआपच निकामी! 

खरे तर 'टेकू' म्हणजे 'आधार' असा सरळ अर्थ आहे. पण मानवी वृत्तीचा विचार करता अनेक प्रकारचे 'मानवी टेकू' दिसून येतात. जसे पावसाळ्यात वेलींना व पडक्या घराला टेकू खूप महत्वाचा तसे काही टेकू राजकीय वा सामाजिक जीवनात देखील भेटत असतात. 

'राजकीय युती' ही कमजोर छपराला असलेल्या 'टेकू'ची आठवण करुन देते. कधी युती तुटेल म्हणून दोघेही गट एकमेकाना बिल्कुल दुखावणार नाहीत! अशा युतीत मन रमविणाऱ्या काही टेकूना सतत वाटत असतं कि आपण खूप महत्त्वाचं काम करीत आहोत. त्यामुळे जिथे कुठे कमकुवतपणा दिसला तिथे जाऊन टेकूची भूमिका घेऊन आपला मोठेपणा सिद्ध करायचा प्रयत्न करतात. पण जसं 'ओझं' होतंय असं दिसले कि लगेच काढता पाय घेतात. असो.

काही टेकू भल्यासारखे असतात. स्वतःचा उपयोग दुसऱ्याला शिडी सारखा करतात. काही मजबूत खांबासारखे असतात, जुन्या कमजोर झालेल्या खांबाची जागा घेतात छत टिकवून ठेवतात! एखाद्या झाडाच्या फांद्या मोठ्या झाल्या त्या तुटू नये, झाड पडू नये म्हणून त्या फांद्यांना देखील टेकू लावतात! सामाजिक संगठना मध्ये असे टेकू देखील आवश्यक ठरतात. 'टेकू'त जर क्षमता असेल आणि त्या आधाराने काही भले होणार असेल तर मनुष्य प्राण्याने असा 'टेकू' बनणे चांगले! निश्चित बनावे. पण नेहमी स्वतःला टेकू बनवत राहण्यात काही अर्थ नाही. आणि कायम टेकू च्या आधारावर दिवस काढणे पण ठीक नाही. कारण टेकू म्हणजे केवळ निर्जीव आधार. 

मला वाटते जर सजीव आहोत तर मोठे 'झाड'च बनले पाहिजे! असे झाड ज्याच्या अंगा खांद्यावर पक्षी व प्राणी खेळतात, फुले-फळे चाखतात, विसावा घेतात! हेच पक्षी प्राणी त्या झाडाच्या बिया पसरवतात. झाडाच्या फांद्यांवर प्राणी पक्षीच नाही तर प्रसंगी परजीवी वेली देखील मोठ्या होतात. पण कालांतराने त्या संपून जातात. असो. 

पण झाड हे झाड राहते. या झाडाचे आयुष्य संपले म्हणजे ते 'निर्जीव' झाले कि त्याचे लाकूड इमारतीला, उद्योग अवजारांना व काही 'टेकू' म्हणून तर काही सरपण! हे साहजिकच आहे.

सोमवार, २१ जून, २०२१

बालसन्गोपनाचे किस्से

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लवकरच गाथा चार वर्षांची होईल. जवळपास गेले वर्षभर आठवडा-दोन-आठवड्यात का होईना पण किमान एक तरी व्यक्ती अशी असतेच जी तिच्या शाळेबद्दल चौकशी करते. अजून शाळेत नाव नाही घातले (टाकले) म्हटल्यावर निदान ऑनलाइन क्लासला तरी बसवायला पाहिजे असा सल्ला आवर्जून असतो. सर्वच पालकांना आपल्या पाल्यांच्या बाबतीत काळजी आहे. लहान मुलांच्या बाबतीत विशेष काळजी असते. त्यापोटी नेहमी आम्हाला गाथाबद्दल सूचना व मार्गदर्शन मिळत असते. गाथा ची शाळा हा आमच्या घरातला सध्या चर्चेचा विषय! आत्ता कुठे चार वर्षांची होत आहे ती! 

खरं तर एवढ्या लहान मुलांना शाळेत? ते ही पुस्तके, वह्या, शाळेचा घरचा अभ्यास, प्रसंगी बाहेरची शिकवणी? हा सगळा विचार केला कि डोकं जड होतं. सकाळी-सकाळी तीन-चार वर्षांची (आता तर अडीच वर्षांची देखील) मुले आपल्या आईवडिलां सोबत किंवा शाळेच्या बस/ व्हॅन ने शाळेला जाताना दिसली की वाटते - इतक्या लहान मुलांना कशाला हवी शाळा?
 
आधीच चौकटीतले जिवन जगणारे आपण! त्यातही आता स्पर्धेच्या युगात आहोत म्हणून मुलांचे बालपण खेळण्यासाठी असते हे त्यांना उमगण्याच्या आतच त्यांच्याकरीता देखील चौकटी आखून त्यांना वेळापत्रकात बसवून मोकळे होतो. मुलांची चौकट म्हणजे शाळा, शाळेतील अभ्यास, घरचा अभ्यास, बाहेरची शिकवणी हे ठरलेले आहे. आमच्या शेजारी ताई लहान मुलांची शिकवणी घ्यायच्या. त्यांच्या शिकवणीत सगळी मुले तीन ते सहा वर्ष गटातील. 

या शिकवणीत देखील आता वेगवेगळे प्रकार आहेत. आई वडिलांना आवडतं, त्यांची इच्छा आहे  म्हणून नाच गाणे किंवा इतर कोणतातरी क्लास (शिकवणी). अशा क्लासला जाणाऱ्या मुलांना विचारले तर सांगतील कि आई किंवा वडिलांनी या क्लासला टाकले. मुलांचे पालक म्हणतांना दिसतात कि "आम्ही नाही करु शकलो आवड असून देखील, म्हणून आमचे स्वप्न मुलं पूर्ण करतील." आपली स्वप्ने आपण लादतोय असे हे पालकांना लक्षातही येत नसेल काय?

शिकवणी च्या आधी विषय सुरु झाला होता शाळेचा. प्रश्न आहे की मुलांना कोणत्या वयात शाळेत पाठवायचे? कधी शिकवणी सुरु करायची? मी प्राथमिक धडे गावातल्या शाळेत घेतले. तिथे बालवाडी होती. केजीबीजी शहरात होती. त्यामुळे याच्याशी आमचा संबंधच नव्हता. बालवाडीत मस्त खेळ, गाणी, गमती-जमती आणि हसणे-खेळणे. अक्षर ओळख कशी झाली ते कळलंच नाही. सहा वर्षांचे असताना पहिली. स्पर्धा वैगेरे फारशी माहितीच नव्हती. थोडक्यात काय दडपण दबाव नव्हता.

आपण आजुबाजुला पाहिले तर अनेक अधिकारी पदावर वा विविध क्षेत्रांत कार्यरत व्यक्ती आवर्जून उल्लेख करतात कि, ते किती खडतर परिस्थितीतून पुढे आले. गावात, सरकारी शाळेतील वा छोट्या शाळेत शिकलोय. पण हेच जे स्वतः छोट्या शाळेत शिकले अन मोठ्या हुद्द्यावर पोहोचले, त्यांना आता वाटतेय की इंटरनॅशनल, मोठ्या स्कुल मधील शिक्षण चांगले! हा विरोधाभास का? 

लहान मुले काय केले तर जीवनात पुढे जाऊ शकतात यशस्वी होऊ शकतात यासाठी डॉ बाबासाहेब आंबेडकरांचे जीवन बालपणा पासून समजून घ्यावे लागेल. डॉ बाबासाहेब आंबेडकर त्यांच्या बालपणी फार खट्याळ होते, खूप खेळायचे, खोड्या करायचे. विशेष म्हणजे त्यांनी स्वतः सांगितले कि पदवीधर होईपर्यंत त्यांच्या हातून काही महत्त्वाचे काम होईल असे त्याना वाटत नव्हते. तेच डॉ बाबासाहेब आंबेडकर आज जगातील काहीच परंतु अत्यंत विद्वान, नैतिक व क्रांतिकारी महान व्यक्तींपैकी एक म्हणून जगाच्या इतिहासात अजरामर, अनुसरणीय व अत्यंत सन्माननीय आहेत. 

असे कसे घडले? बाबासाहेब आंबेडकरांचे जीवन चरित्र वाचले तर पटते कि निश्चितच योग्य वयात योग्य माहिती व शिकवण मिळाली तर नक्कीच व्यक्तीचे आयुष्य महान बनू शकते.

शनिवार, १९ जून, २०२१

मोबाइल, कॉम्पुटर, टीव्ही, खेळ व शिक्षण


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जवळपास 25-30 वर्षांपूर्वी मोबाइल नव्हते, कॉम्पुटर नव्हते. टीव्ही व टेलिफोन फारच कमी लोकांकडे होते. बऱ्यापैकी घरात रेडियो असायचे. तेव्हा आईवडील आपल्या मुलांसोबत असे वागत होते? मोबाइल, टीव्ही नसल्यामुळे लहान मुले मोठ्यांच्या आजूबाजूला, किंवा अंगणात मुलांच्या घोळक्यात खेळत. घरातील मंडळी कामात असली तरी मुले त्यांच्या आजुबाजुला खेळतांना, मोठी माणसे काय व कशी करतात? याकडे लक्ष ठेवून असत. (आजही तसेच करतात).

मला आठवतेय, तेव्हा मोठी माणसे पण मुलांसोबत गप्पागोष्टी करत, आपण काय करतोय याबद्दल माहिती देत. त्यामुळे नवे नवे शब्द माहित होत. ती माहिती त्यांनी सांगितलेल्या शब्दांत साठत राही. शाळेत खेळ, गाणी याच्या सोबत 'घरी माहिती झालेले शब्द' 'लिहिता येतात' याचा आनंद व्हायचा. शाळेतले खेळ, गाणी, अक्षर ओळख, शब्द ओळख सगळेच खूप आवडायचे! मग काय, शिक्षण आवडीचे.
 
पण आता सगळीकडे शिक्षणाचे नवनवीन प्रकार आलेत! स्पर्धेचे युग आहे म्हणतात! त्याकाळातही स्पर्धा होती पण आजची जरा वेगळीच! म्हणून आजचे पालक म्हणतात मुले म्हणजे जवाबदारी आणि आपण त्याअर्थाने जबाबदार पालक. माझ्या मुलांना जर काही आले नाही तर आम्ही जबाबदार पालक नाही हे सिद्ध होणार! ही भीती सतत असते. मुलांचे संगोपन, पालनपोषण म्हणजेच शाळा असे जाणून आता आपण सगळेच पैसे मोजून प्री-स्कूल, ट्यूशन लावून आपली जबाबदारी शिक्षकांवर टाकून मोकळे होतो. 

पण लहान वयातच एवढे क्लास? एवढ्या शिकवण्या? ज्यांना अनुभव आहे ते सांगतात कि मुले तीन-साडेतीन वर्षांची होतात तेव्हा ती खट्याळ-खोडकर असतात, त्यांना जे नको असतं त्याला नाही बोलतात. जे हवं त्यासाठी रडारड किंवा ओरडून जे हवय ते द्यायला (हट्ट पूर्ण करायला) लावतात. हाच खट्याळपणा हळू हळू घरच्यांना मुजोर वागणे वाटायला लागते. परिणामी मुलांच्या अशा वागण्याला निर्बंध लावण्यासाठी किंवा वळण लावायचा प्रयत्न म्हणून त्यांना 'कुठेतरी गुंतवून ठेवले पाहिजे' असे पालक ठरवितात.

हे वळण आपण लहानपणापासूनच लावत आलेलो असतो. अगदी तान्हा बाळाला देखील वळण लावावे लागते. जगण्याचे काही नियम माहित व्हावेत म्हणून आपण प्रयत्न करीत असतो. पण सहजपणे असा विचार काय प्रत्येकाच्या मनात येत असावा काय?

आपण बघतो कि जेव्हा मूल जन्माला येतं तेव्हा घरातली वडीलधारी मंडळी त्या बाळा साठी पूर्ण वेळ तयार असतात. त्याच्या सगळ्या गोष्टी बघतात. तहान भूक, अंघोळ-पांघोळ, हसणं-बघणं, ऐकणं-बोलणं, पकडणं-रांगणं-चालणं-धावणं-पडणं सगळ्याकडे लक्ष दिल जातं.  

 याचबरोबर घरात काही जण असेही असतात कि जे त्यांना वाटेल तेव्हा लहर म्हणून बाळाला झोपेतून उठवून त्याच्याशी गप्पा मारतात, म्हणजे आपल्याला हवे तेव्हा बाळाशी खेळतात. बाळही त्याला प्रतिसाद देते. कधी रडते तर कधी हसते. 

पण जस जसे बाळ मोठे होत जाते, चालायला लागते, एक-एक गोष्ट शिकायला लागत असते, तेव्हा त्याच्या विकासाच्या किती गोष्टींबद्दल आपल्याला माहिती असते? किती गोष्टींबद्दल आपण विचार करतो?

मुलांना त्यांच्या क्रियांना आपण कशा प्रतिक्रिया देतो? मुलं जेव्हा नवनवीन गोष्टी बघून त्याबद्दल विचारतात तेव्हा? किंवा स्वयंपाक घरातील भांडी दुसऱ्या खोलीत किंवा बाहेर घेऊन खेळ मांडतात तेव्हा? घराच्या भिंती किंवा जमिनीवर वस्तूने ओरखडे ओढतात तेव्हा? आपण करत असलेल्या गोष्टींचे अनुकरण करतात तेव्हा? आपण त्यांच्याशी कसे वागत असतो, याचा विचार आपण करतो का? 

आता सर्वच मुलांच्या हातात मोबाईल खेळणे म्हणून येत आहे. मुलांना एंगेज ठेवायचे म्हणून मोबाईल हाती देणे किंवा टीव्ही लावून देणे सोपे झाले आहे. पण यातून मुलांना काय मिळणार आहे? यामध्ये खेळ आहे कि शिक्षण आहे? हा प्रश्न आपल्याला पडला पाहिजे का?

एवढा सगळं विचार केल्यावर शिक्षण व खेळ यात काय साम्य आहे? यावर विचार होणे आवश्यक आहे असे वाटते. शिक्षणावरून लक्षात येत आहे कि मुलांचे लालन-पालन, भरणं -पोषण, पालन-पोषण, संगोपन यावर खरेच पालकांसाठी देखील शिकवणी ची आवश्यकता आहे असे वाटत आहे.    

आपल्या मुलाना मोठे होताना पाहण्यासारखं सुख नाही. सहभागी करुन घेत ते अजुन सोपे आहे. यातुन मुले सहज शिकतात.

सोमवार, १२ ऑक्टोबर, २०१५

चहासोबत लेक्चर

"एक विचारू काय बाई, तुम्हाला राग तर नाही येन न" तिने संकोचल्यासारखे आईला विचारले.
"विचारा, राग कश्याला येणार" आई म्हणाली.
मग तिला थोडा धीर मिळाला आणि ती बोलली "तुम्ही आधी खूप गरीब होत्या म्हणे? खंर आहे ना"?
"हो"
"…… तो सांगत होता आम्हाले, तुम्ही आता श्रीमंत कसे झाले म्हणून" ती मोठ्या उत्सुकतेने म्हणाली.
"कसे ?" आईने विचारले
"तुम्ही म्हणे …… या बुवाचा नवस केला अन तो पावला तुम्हाले, म्हणून त तुम्ही झोपडीतून या बंगल्यात रहायाले आले. लय पैसे भेटले म्हणे " आपल्याला काहीतरी मंत्र मिळेल या हेतूने ती अधिकच स्पष्ट बोलू लागली होती.
"काय ?"
"आमच्या तिकडे सगळे जन तेच म्हणतात" ती म्हणाली
"ये घरात " भिंतीवरचे फोटो दाखवत आई म्हणाली "हे कोणाचे फोटो आहे?"
बाबासाहेब, जोतीराव फुले, सावित्रीबाई, रमाई, बुद्ध ….
"सगळ घर फिरली तरी हेच अन पुस्तक, कोणताच बुवाचा फोटो नाही आमच्या घरात, बुवावर विश्वास ठेवला असता तर,माझी पोर बुवा झाली असती ऑफिसर नाही, मुलं शिकली नसती अन परिस्थिती पण बदलली नसती."
"मग तो कावून असा म्हणते? अन लय लोक म्हनतात" तिची शंका तिने विचारलीच
"आम्ही गरीब होतो, पण पोरांना शिकवले तर ते चांगले जीवन जगतील, म्हणून आम्ही सगळ्या पोरांना शिकविले. माझ्या पोरांना पायात चप्पल पण भेटत नव्हती पण आता माझा नातू आमच्या कार मध्ये शाळेत जातो, दिसते ना, कोणाचं एकू नको, कोणी पावत नाही, लेकराले शिकव मंग तू पण श्रीमंत होशील. फक्त बाबासाहेबाचे ऐक कल्याण होईल.........." चहासोबत मोठे लेक्चर पण ऐकावे लागले त्या बाईला.....
(घरी गेल्यावर ऐकलेला एक मजेदार किस्सा)

विकृत संस्कृती

किती कमजोर आहे हा पुरुष
एखाद्या महिलेचा (ती कोणत्याही वयाची असो) पती निधन पावल्यानंतर तिचे आप्त स्वकीय तिचे सांत्वन करीत असताना एक गोष्ट आवर्जून सांगतात "सांभाळून घे ग बाई, मुलांना तुझ्याशिवाय कोण आहे आता. तूच आता आई अन बाप सुद्धा हो." आणि मग ती सगळ्या दुखावर मात करीत आई आणि बाप या दोन्हीही भूमिका खंभीरपणे पार पाडते. (याला बोटावर मोजण्यासारखे अपवाद असू शकतात)
मात्र हेच चित्र उलट झाले तर ….
तिचे निधन झाल्यास सगळे त्या पुरुषाबद्दल चर्चा करतांना "बिचारा पुरुष एकटा कसा राहील? घरात बाई तर पाहिजेच, मुलांना आई पाहिजेच, तो काय काय करेल? ......." या अश्या अनेक गोष्टी सुरु होतात आणि मग अमक्याची मुलगी आहे, तमक्याची बहिण आहे अशी चर्चा सुद्धा लगेच सुरु होते……
असे पहिले कि वाटते किती कमजोर, दुबळा आहे हा पुरुष …….
आज आपल्या देशात ६ करोडपेक्षा जास्त विधवेच आयुष्य जगणाऱ्या महिला भारतीय समाजाच्या विकृत मानसिकतेच दर्शन घडविते. स्त्रीला सतत दुर्बल बनवणाऱ्या या परंपरा जिवंत असतांना काय "ती" सक्षम होईल ?

असे का ?

सामाजिक परिवर्तन होत असलेल्या भारतीय समाजात दोन वर्ग दिसून येतात. एक परंपरेच्या नावाखाली चाललेल्या शोषणाला संस्कृती आहे, जतन केले पाहिजे म्हणून धडपडतो तर दुसरा वर्ग जो या शोषणाला कायम बळी पडत आला असून आता जागृत होऊन या बाबीला विरोध करतो .
आजकाल शिकलेले विशेषता लोककलेमध्ये उच्च शिक्षण घेतलेले हि कला नष्ट होत आहे म्हणून फार चिंतीत दिसतात. लोककला म्हणजे काय तर जागरण, गोंधळ, जोगवा मागणे इत्यादी. हे असे असेल तर वाघ्या- मुरली, जोगतिनी, देवदासी पण जिवंत ठेवाव्या लागतील.
ज्यांना वाटते संस्कृती टिकून राहावी त्यांनी ती टिकावी म्हणून आपला बळी द्यावा, इतरांना त्यांचे कर्तव्य शिकवू नये.
काय सामाजिक परिवर्तन झालेल्या घरातील आई- वडील आपल्या पाल्याला या लोककलेचा भाग होऊ देतील?

शनिवार, २६ ऑक्टोबर, २०१३

आणि म्हणे स्त्रिया सक्षम झाल्या...

एक मैत्रीण दवाखान्यात आयाचे काम करणारी… (… मावशी), वय 30 वर्षे. शाळेत आठवीमध्ये शिकत असतांना तिच्यापेक्षा तेरा वर्षे मोठ्या पंधरावी शिकलेल्या मुलाशी लग्न झाले. आज ती दोन मुलींची आई, मोठी मुलगी दहावित शिकते. गेली पाच – सहा वर्षे नवरा काहीच काम करत नाही, त्याला वेड लागले म्हणतात. वेडा असला तरि ती उशिरा आलेली चालत नाही, रोज दारू पाहिजेच. तिच्याच आईच्या घरी एका खोलीत संसार करते, मूलींना शिकून मोठे करायचे स्वप्न पाहते. सर्वांचा खर्च कसाबसा तीच करते. तरिपण त्याचे सर्व.... सहन करते. त्याला सोडावे असे तिला वाटत असले तरि तिची आई तिला विरोध करते. कारण काय तर म्हणे शेवटी नवरा आहे, तोच तुला म्हातारपणीचा आधार.... स्वत: मेहनत करून, कष्टाची कमाई खात असली तरि तिच्या जिवनाचा निर्णय ती घेवू शकत नाही.
दुसरी सुशिक्षित व्यवसायाने डॉक्टर. नवरा सुद्धा अभियंता भरपूर कमावतो. दोन मुले, घरी सर्वच सुविधा उपलब्ध म्हणजेच सुखी कुटुंब. दर दोन - तीन दिवसानी मोठ्याने भांडणाचा आवाज, तिच्या आई - बहिनीवरून तिला शिव्या. जीव वाचविण्यासाठी त्या रात्री शेजारी मैत्रिणीकडे ती आधार घेणार, सगळे शांत होण्याची वाट पाहणार. सामाजिक प्रतिष्ठा म्हणून त्याला सोडू शकत नाही. . . या अश्या कितीतरी मैत्रिणी कोणत्या न कोणत्या कारणाने अपमानाचे जिणे जगत आहेत. काय हि समस्या नाही ? काय या व्ययक्तिक समस्या आहेत ? कोण अश्या विकृत पुरुषी मानसिकतेला दंड देणार आणि कोण तिला मानसिक / भावनिक आधार देणार ? काय हे समाजाचे काम नाही.?  
एकीकडे एकुलती एक मुलगी म्हणून तिला हवे ते द्यायचे. समाजात प्रतिष्ठा, आदर्श निर्माण करायचा आणि अपेक्षा करायची कि तिला तिचे निर्णय स्वत: घेवू देणारा जीवनासाथी मिळावा. त्याचवेळी आपल्या पत्नीला काही येत नाही असे गृहित धरून तिला निर्णय घेण्यापासून परावृत्त करायचे. . काय एक मानव म्हणून आपण एकमेकांचा आदर करणार आहोत ? 
 म्हणे स्त्रिया सक्षम  झाल्या.      

शनिवार, १९ ऑक्टोबर, २०१३

किंमत मोजल्याशिवाय परिवर्तन संभव नाही

 डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांच्‍या संदेशास स्त्रियांच्‍या उत्‍थानासंदर्भात समजून घेतांना... 

भारतीय समाजातील स्त्रियांच्या परिस्थितीवर नेहमीच लिहिले जाते, चर्चा केल्या जातात. याबाबत अग्रेसर असणारी प्रसारमाध्यमे नेहमी प्रचार करतात की आज भारतातील स्त्रिया वेगवेगळ्या क्षेत्रात आपला ठसा उमटवित आहेत. सततच्या अशा प्रकारच्या प्रचारामूळे सगळया स्त्रियांचा विकास झाला आहे असे वाटू लागते अर्थात तसा भ्रम निर्माण होतो आणि हजारो वर्षे विकासापासून वंचित असलेल्या बहुजन समाजातील स्त्रियांची परिस्थिती आजही बदललेली नाही, यावर सोयीस्‍करपणे पडदा पाडला जातो. जातीव्यवस्थेमुळे स्त्री त्यातही बहुजन समाजातील स्त्री ही कायम मागासलेली आहे या बाबीवर चर्चा होत तर नाहीच त्‍याचबरोबर त्या आजही शिक्षण, रोजगार, आरोग्याच्या सुविधा अशा अनेक मुलभूत अधिकारांपासून वंचित आहेत इकडेही लक्ष जात नाही. अशा स्थितीत आपल्‍यावर येणाऱ्या असंख्‍य अडचणींवर मात करीत, परिस्थितीला सामोरे जात काहीजणी आपले कुटुंब सांभाळून समाजाचे प्रतिनिधित्व करतांना दिसून येतात. ही जरी जमेची बाजू असली तरी हे प्रतिनिधित्‍व वाढवत नेऊन शोषित वर्गातील समस्‍त स्त्रियांचा सर्वांगिण विकास घडवून आणण्यासाठी काम करावे लागेल हे सत्‍य स्‍वीकारावे लागेल.
स्त्रियांच्या सर्वांगीण विकासाच्‍या दृष्‍टीने विचार केल्‍यास सर्वप्रथम लक्ष जाते ते त्‍यांना भेडसावणाऱ्या असंख्‍य समस्‍यांकडे. मग त्‍या समस्‍या घरातील असोत, वस्‍तीतील असोत अथवा समाजातील, स्त्रीच्‍या समस्‍या अपार आहेत. कुटुंबाचे, जातीचे, धर्माचे व परिस्थितीचे बंधन म्हणून जे काही शालेय शिक्षण तिला मिळते ते एक तर विकासाच्‍या दृष्टिकोणातून अपूरे असते आणि त्‍यात भर म्‍हणून की काय परंपरेतून तिची जी जडणघडण होते ती तिच्‍यासाठी संकटे निर्माण करणारी ठरतात व ती अनेक अत्‍याचारांना बळी पडते. अशी कोणती यंत्रणा आढळून येत नाही की जी स्‍त्रीला स्‍वतंत्र करेल, नव्‍या जगाच्‍या निर्मितीची तीची जी जबाबदारी आहे ती पेलण्‍यासाठी तिला सक्षम करेल. फुले-आंबेडकरी विचारधारेमध्‍ये स्‍त्रीला स्‍वतंत्र करणारे संपूर्ण मार्गदर्शन आहे. परंतु ते अंमलात आणण्‍याची म्‍हणजेच प्रत्‍यक्ष कृतीत उतरविण्‍याची जबाबदारी कोण घेणार? हा खरा प्रश्‍न आहे.
परंतु आज स्‍त्रीच्‍या पोटी सुदृढ बाळ जन्‍माला यावे किंवा स्‍त्री-पुरुष असमतोल होवू नये म्‍हणून यंत्रणा झटतांना दिसतात. सरकारी किंवा एनजीओंच्‍या आरोग्‍य विषयक यंत्रणा याकरीता मोठा खर्च करतांना दिसतात, मोठया-मोठया पंचतारांकीत चर्चासत्रांचे आयोजन करतात. परंतु तिच्‍या मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक, शैक्षणिक, कलाकौशल्‍यगुण अशा सर्वांगिण विकासासाठी काम करण्‍यासाठी यंत्रणांचे हात अखडतात, थरथरतात. स्‍त्रीवर कुटुंब व समाज घडविण्‍याची जबाबदारी आहे असे म्‍हंटले जाते परंतु ती तीची ही जबाबदारी पेलण्यासाठी सक्षम व्हावी यासाठी यंत्रणांची शोधाशोधच करावी लागते.
अशा स्थितीत, जीवन जगतांना स्‍त्रीवर टाकण्‍यात आलेल्‍या जबाबदाऱ्या, तिला अस्तित्‍वासाठी करावा लागणारा संघर्ष, तिच्‍या वाटयास येणारी मानहानी या सर्वांना तोंड देत-देत ती फक्‍त जीवन जगत असते. आणि मग नशीब, दैव, कर्मकांड याच्‍या आहारी जाते. साहजिकच अशा प्रकारे जीवन जगणाऱ्या स्‍त्रीची येणारी प्रत्‍येक पिढी सुद्धा तिच्यासारखीच आपले नशीब वाईट मानून वाट्याला आलेले अपमानाचे जिवन जगते. या संदर्भात फुले-आंबेडकरांनी जे मार्गदर्शन केले आहे ते समजून घेतले तर आपल्‍याला सन्मानाचे मानवी जीवन आणि प्रत्‍यक्षातील अमानवीय जीवन याची तूलनात्‍मक प्रचिती येते. परंतु हे केवळ वैचरीक न राहता फुले-आंबेडकरांनी केलेले मार्गदर्शन प्रत्‍यक्षात कृतीत आणण्‍यासाठी कार्य करण्‍याची आवश्‍यकता आहे.
ही बाब लक्षात घेऊन आपल्‍या मार्गदात्‍यांनी केलेल्‍या मार्गदर्शनाला समजून घेत-घेत आम्‍ही काही महिलांनी “क्रांतिज्योती” या नावाने पुण्‍यात एक ट्रस्‍ट स्‍थापन केला. आम्‍ही आमच्‍या कामाचे क्षेत्र ठरविले. त्‍यासाठी आम्‍ही सहा महिने, वर्षभराची योजना बनवून कार्यक्रम आखणी करुन त्‍यावर रोज अंमल करतो. म्‍हणजेच आम्‍ही केवळ विशिष्‍ठ दिवशी किंवा वेळी आयोजित कार्यक्रमापुरते मर्यादीत नसतो तर सततच्‍या प्रक्रियेत आम्‍ही स्‍वतःला गुंतवून घेतले आहे. या प्रक्रियेमध्ये आम्ही सगळ्याजणी रोज आमच्‍या कार्यालयात एकत्र येवून कार्यालयीन वेळेत कामे करतो. “क्रांतिज्योती” या नावाने आम्‍ही करीत असलेले कार्य हे एक “मॉडेल” म्‍हणून आम्‍ही विकसीत करीत आहोत.
या अंतर्गत आम्‍ही आमचे कार्य मुख्‍यत्‍वे दोन भागात विभागलेले आहे. महिलांना त्‍यांच्‍या स्‍वतःच्‍या, कुटुंबाच्‍या व समाजाच्‍या समस्‍या सोडविण्‍यासाठी नेतृत्‍वविकासाचे प्रशिक्षण. तसेच आर्थिक समस्‍यांतून बाहेर निघण्‍यासाठी कौशल्‍याधारीत व्‍यवसायिक प्रशिक्षण आणि व्यवसाय उभे करण्‍यासाठी सहकार्य. नेतृत्‍व विकास प्रशिक्षण हा जरी सतत चर्चेत येणारा शब्‍द प्रयोग असला तरी आम्‍ही देत असलेले प्रशिक्षण हे फुले-आंबेडकरांच्‍या विचारधारेवर आधारीत आहे. याचा एक अभ्‍यासक्रम आम्‍ही बनविला आहे. आम्‍ही ‘‘क्रांतिज्‍योती स्‍टडी अॅंड ट्रेनिंग सेंटर’’‘‘रमाई व्‍होकेशनल ट्रेनिंग अॅंड बिजनेस सेंटर’’ असे दोन प्रकल्‍प सुरु केले आहेत. अर्थार्जनसाठी व्‍यवसाय करणाऱ्या महिलांच्‍या उत्‍पादनांना बाजारपेठ मिळवून देण्‍यासाठी आम्‍ही “ब्‍लू बर्ड्स” या नावाने वस्‍तूविक्रिकेंद्र (शॉप) सुरु केले आहे. आमच्‍या प्रत्‍येक कामाचे आम्‍ही आमच्‍यापरीने डॉक्‍यूमेंटेशन म्‍हणजेच दस्‍तावेजीकरण करीत असतो.
आमचे हे कार्य अनेक परिस्थितींना सामोरे जात, समस्‍यांवर मात करीत आम्ही सुरु केले आणि पुढे नेत आहोत. आज पुण्‍यातील येरवडा, विश्रांतवाडी परिसरातील ५०० पेक्षा जास्त कुटुंबांशी आम्‍ही संवाद साधला. ६०० पेक्षा जास्‍त महिलांचे संघटन करीत आहोत. ४० पेक्षा जास्त महिला स्‍वंयस्‍फुर्तीने स्‍वयंसेवक म्हणून काम करतात. यातील बऱ्याच महिला २७ स्वयंसहाय्यता गट, २ व्यवसाय गटांत कार्यरत आहेत. व्यवसाय प्रशिक्षणातून तयार झालेल्या महिला रोजगार मिळवित आहेत. ज्या महिलाना स्वत:चे नाव सांगायला सुद्धा भीती वाटत असे त्या आज ७०-८० लोकांसमोर उभे राहून मनोगत व्यक्त करतात, बहुजन समाजाच्या, स्त्रियांच्या समस्यावर बोलतात, महापुरुषांचे विचार कृतीत उतरवित आहेत. एवढेच नाही तर आपल्‍या समस्‍या जर सरकारी कामाशी संबंधीत असतील तर त्‍यासंदर्भात अर्ज लिहितात, आपल्या वस्तीतील समस्या सोडविण्‍याचा प्रयत्‍न करतात, मुलींचे व मुलांचे अभ्यासवर्ग घेवून त्यांचे भवितव्य उज्ज्वल बनविण्यासाठी झटतांना दिसतात. या सर्वांमागे बहुजन समाजाच्‍या महानायिका व महानायकांची प्रेरणा आहे. बहुजन समाजातील महानायक महानायिकांनी सतत महिलांच्या प्रगतीवर भर दिला आहे. या कार्याप्रती आम्‍ही समर्पित आहोत.
हे सर्व कार्य संघटीत व सातत्‍यपूर्ण प्रयत्‍नांची मागणी करते. हे संघटीत व सातत्‍यपूर्ण कार्य करीत असतांना अनेक साधन-संसाधनांची नेहमी जमवाजमव करावी लागते. डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांनी सांगितले आहे कि किंमत मोजल्‍याशिवाय परिवर्तन संभव नाही. येथे किंमतीचा अर्थ हा वेळ, बुद्ध‍ि, कौशल्‍य, संसाधने व रुपये यांच्‍याशी संबंधीत आहे. एखाद्या मंडळाच्या माध्यमातून जेव्हा जयंती किंवा गुणवंत विद्यार्थ्यांचा सत्कार समारंभ आयोजित केला जातो तेव्हा त्यासाठी त्या मंडळाची वर्गणी गोळा करतांना किती दमछाक होते, यावरुनच आम्ही महिला हे सगळे कसे सांभाळतो याचा आपण अंदाज करू शकता.
वर उल्‍लेख केल्‍याप्रमाणे आम्‍ही “क्रांतिज्योती” हे एक मॉडेल म्‍हणून विकसित करीत आहोत. जेथे अनेक महिला कार्य करतील. केवळ शहरी भागातच नव्‍हे तर ग्रामिण भागातही हे मॉडेल कशाप्रकारे अमलात आणता येईल याचा प्रयत्‍न आम्‍ही करीत आहोत. महिलांचे जे संघटन (संघटना नव्‍हे) आम्‍ही घडवित आहोत व जे काही प्रयत्‍न आम्‍ही करीत आहोत त्या प्रयत्नांना आलेले यश हे जे-जे लोक क्रांतिज्‍योतीच्‍या कार्यालयाला भेट देतात त्‍यांना अनुभवास येते. गेली दोन वर्षे सतत आम्ही सगळ्याजणी काम करीत आहोत. क्रांतिज्‍योतीच्‍या कार्यालयात सात जणी वेगवेगळया जबाबदाऱ्या सांभाळतात. कार्यालय म्‍हंटले की अनेक बाबींचा खर्च हा होतोच. मग ते कार्यालयाचे भाडे असो, लाईटबील असो, टेलिफोनचा खर्च असो, स्‍थानिक प्रवास खर्च, स्‍टेशनरी, आकस्किम खर्च असो, कार्यालयात काम करणाऱ्या मैत्रिणींचे मानधन असे अनेक खर्च आहेत ज्‍याकरीता आम्‍हाला नेहमी आर्थिक जमवाजमव करावी लागते. प्रत्‍येक महिन्‍याच्‍या पहिल्‍या व शेवटच्‍या आठवडयात आम्‍हाला याकरीता प्रचंड मेहनत करावी लागते. अनेक लोकांना भेटावे लागते. महिन्‍यातील कामाच्‍या चार आठवडयांपैकी जर दोन आठवडे या मध्‍येच जायला लागले तर अपेक्षित रिझल्‍ट अपेक्षित वेळेत यायला अनेक अडचणी येतात.
हे सर्व करीत असतांना जेव्‍हा आम्‍ही समाजाकडे बघतो तेव्‍हा हे जाणवतेच की आपले महानायक फुले-आंबेडकरांच्‍या महान कार्यामुळे, चळवळीमुळे समाजात एक असा वर्ग निर्माण झाला आहे की ज्‍याच्‍या भौतिक गरजांची पूर्तता झाली आहे. केवळ एवढेच नाही तर त्‍याहीपेक्षा आता त्‍यांची खरोखरीच चंगळ झाली आहे असे म्‍हंटले तर वावगे ठरणार नाही. प्रत्‍येक शहरात कमीत कमी हजार-पाचशे जण असे असतात की ज्‍यांनी वर्षाकाठी दहा हजार रुपये जरी आपल्‍या चंगळवादातून बाजूला काढले तरी वर्षाकाठी ५० लाख ते १ कोटी रुपये सहज निर्माण होवू शकतात. महानगरांमध्‍ये तर हा आकडा प्रचंड मोठा होवू शकतो. आज जे काही चळवळीचे कार्य सुरु आहे ते खऱ्या अर्थाने ज्‍यांना समस्‍येची जाणीव आहे त्‍यांच्‍या आर्थिक योगदानाच्‍या जोरावर सुरु आहे. नमूद करण्‍यासारखी बाब ही आहे की समस्‍येची जाणीव असणारा जो वर्ग आहे तो स्‍वतःच इतका समस्‍यांनी ग्रस्‍त आहे तरीही तो त्‍याच्‍या परीने कोणताही कार्यक्रम असो मग तो जयंतीचा कार्यक्रम असो, सामाजिक असो, धार्मिक असो, राजकीय असो, शैक्षणिक असो, प्रबोधन असो, साहित्‍य असो किंवा संघर्ष असो मोठ्या प्रमाणावर सहभागी होत असतो. कारण या कार्याचे महत्व त्यांना पटलेले असते. समाजात यावर्गाव्यतिरिक्त दुसरा वर्ग असा देखील असतो की त्याला वाटत असते की सचोटीने व इमानदारीने कार्य करणारे कार्यकर्ते निर्माण व्‍हावेत. परंतु या करीता साधनसंसाधनांची आवश्‍यकता असते ही बाबदेखील आपण समजून घेतली पाहिजे.
 आम्‍ही महिलांनी जे कार्य हाती घेतले आहे, जे मॉडेल निर्माण करण्‍याचा प्रयत्‍न आम्‍ही करीत आहोत त्‍याला आपल्‍या सर्वांच्‍या मदतीची विशेष म्‍हणजे आर्थिक मदतीची अत्‍यंत आवश्‍यकता आहे. प्रत्‍येक तालुक्‍यात महिलांचे पाच हजार लोकसंख्‍येनुसार सात-आठ जणींचे दोन-तीन समूह जरी रोज योजनाबद्ध पद्धतीने कार्य करु लागले तर मोठे परिवर्तन येणाऱ्या काळात घडू शकेल यावर आमचा विश्‍वास आहे. परंतु याकरीता केवळ शाब्दिक मार्गदर्शन नव्‍हे तर प्रत्‍यक्ष सहकार्याची आवश्‍यकता आहे. जर आपल्यात खरोखरच सहकार्याची भावना निर्माण झाली तर कृपया अधिक माहितीसाठी www.krantijyoti.org ला भेट द्या.  

शनिवार, ७ जानेवारी, २०१२

ओवी सावित्रीची

पहिली माझी ओवी ग ! सावित्रीच्या बुद्धीला !
स्त्रियांच्या शिक्षणाचा ! पाया तू घातला !
अशिक्षित अडाणी तू ! पतीपाशी शिकली !
मुलींसाठी पहिली ! शाळा तुम्ही काढली !!

दुसरी ओवी गायिली ! तुझ्या ग धैर्याला !
दगडगोटे खाऊनी ! चालवली तू शाळा!
घराबाहेर काढले ! गुंडानी अडविले !
धीराने तोंड दिले ! सगळ्या ग त्रासाला !!

तिसरी माझी ओवी ग ! तुझ्या मोठ्या मनाला !
फसलेल्या विधवेचा ! सांभाळ तू केला !
अबला नि अनाथांचे ! मायबाप होऊन !
यशवंत बाळाला ! दत्तक घेतला !!

चौथी ओवी गायिली ! तुझ्या थोर हृदयाला !
माणुसकीचा झरा ज्यात ! नित्य ग वाहिला !
जोतबांची सावली ! नाही तू राहिली !
सत्यधर्मप्रकाशात ! तेजानं तळपली !!

दुःखितांच्या सेवेत ! देह तू ठेविला !
स्मरण तुझे करूनी ! वसा मी घेतला !
भगिनींना जागवीन ! संघटित करीन !
ज्ञानज्योत लावीन ! हेच तुला नमन !!

सोमवार, ५ डिसेंबर, २०११

“प्रिव्हेंशन ऑफ अँट्रॉसिटिज अ‍ॅक्ट” ही ‘त्यांना’ समस्या का वाटते?

मिर्चपुर जातीय अत्‍याचार
      नुकताच दिल्ली विशेष न्यायालयाने “प्रिव्हेंशन ऑफ अँट्रॉसिटिज अ‍ॅक्ट” अंतर्गत चालविल्या गेलेल्या मिर्चपुर जातीय अत्याचार खटल्याचा निकाल दिला. २१ एप्रिल २०१० रोजी हरियाणातील मिर्चपुर गावातील जाट जातीच्या ९८ लोकांनी वाल्मिकी या अनुसूचित जातीच्या वस्तीवर हल्ला केला होता. या जातीय हल्ल्यात ७० वर्षीय ताराचंद व त्यांच्या अपंग मुलीला जीवंत जाळण्यात आले होते. हा जातीय अत्याचार असल्याने या गुन्ह्याची नोंद “प्रिव्हेंशन ऑफ अँट्रॉसिटिज अ‍ॅक्ट १९८९” नुसार करण्यात आली.
      हा खटला सर्वोच्च न्यायालयाने दिल्लीत वर्ग केला होता. या विशेष न्यायालयातील न्यायाधीश डॉ. कामिनी लाऊ यांनी या खटल्यावर निकाल दिला. निकाल देतांना “अँट्रॉसिटिज अ‍ॅक्ट” मध्ये बदल करुन तो जातीनिरपेक्ष करावा अशी सुचना त्‍यांनी दिली. या सुचनेमध्ये डॉ. लाऊ यांनी म्‍हंटले की दलित व आदिवासींवर सवर्णांनी अत्याचार केले तर तो अपराध ठरविणारा व त्यासाठी शिक्षेची तरतूद करणारा हा कायदा बदलावा व तो जातीनिरपेक्ष करावा.

गुरुवार, ३ नोव्हेंबर, २०११

देवदासी सोडण्याची कारणे

"देवदासी शोध आणि बोध" या वसंत राजस लिखित पुस्तकातील हे एक प्रकरण. या पुस्तकात लेखकाने देवदासी या अनिष्ट प्रथेवर सर्व अंगानी प्रकाश टाकला आहे. सामाजिक बदलासाठी काम करणार्‍या सर्वांनी अभ्यासावे असे हे संग्रही पुस्तक आहे. आजही काही विशिष्ठ समाजात अंधश्रद्धेमुळे आपल्या मुला-मूलींना देवाला सोडण्यात येते. या कृत्याला कायद्याने बंदी असली तरी काही लोकं आपल्या स्वार्थासाठी या अशा रुढी-परंपरांना जीवंत ठेवण्याचे काम करतात आणि अशिक्षीत,अज्ञानी समाज त्याला बळी पडतो.या प्रकरणात लेखकांनी देवदासी सोडण्याच्या धार्मिक,सामाजिक आणि आर्थिक कारणांवर माहिती दिली आहे.







शुक्रवार, २८ ऑक्टोबर, २०११

बौद्धांच्या ब्राह्मणीकरणाला जबाबदार कोण?

१४ ऑक्टोबर १९५६ अशोकाविजयादशमीच्या दिवशी डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांनी आपल्या लाखो शोषित, पिडित अस्पृश्य बांधवांना विषमतेवर आधारित ब्राह्मणीधर्मातून बाहेर काढून समानतेवर आधारित बौद्ध धम्माची दिक्षा दिली. त्यांनी धम्मदिक्षेसोबत २२ प्रतिज्ञा दिल्या. तेव्हाच्या शोषित, पिडित अस्पृश्य बांधवांनी या बदलाचा स्विकार सुद्धा केला. २२ प्रतिज्ञांचे पालन करण्यासाठी आपल्या घरातील दगड-धोंड्याचे देव फेकून दिले, स्वतः अशिक्षित असले तरि या पिडित समाजाने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांनी दिलेले तत्त्व “शिका, संघटित व्हा, संघर्ष करा” आत्मसात केले. आपल्या मुलांना शिक्षण दिले, त्यासाठी वाट्टेल ते कष्ट सहन केले, मोलमजुरी केली पण मुलांच्या शिक्षणात खंड पडू दिला नाही. संविधानाच्या माध्यमातून डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांनी स्वातंत्र्य, समता आणि बंधुता दिली. तसेच अन्न, वस्त्र निवारा या मुलभुत अधिकारासोबत शिक्षणाचा सुद्धा अधिकार दिला. शिक्षणामध्ये फि माफी, शिष्यवृत्ती मिळाली. शिक्षण मिळाले, नोकर्‍या सुद्धा मिळाल्या, काहींनी व्यवसाय केले, अशा विविध मार्गाने या शिक्षित लोकांकडे आर्थिक सुबत्ता आली. ब्राह्मणी धर्मव्यवस्थेने ज्यांना समाजात चपलेचे स्थान दिले होते, त्यांना या धर्मांतरामुळे सन्मानाचा जिवनमार्ग मिळाला.